मुख्यपृष्ठस्तंभधर्मो रक्षति रक्षित : आस्था के आवरण में अनाचार!

धर्मो रक्षति रक्षित : आस्था के आवरण में अनाचार!

मनमोहन सिंह

भारत एक ऐसा देश है, जहां चेतना के सर्वोच्च शिखर को ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम’ के रूप में देखा गया है। यहां की मिट्टी में त्याग, तपस्या और आत्मोत्सर्ग की सुगंध रही है। लेकिन अत्यंत क्षोभ का विषय है कि आज इसी देश में आस्था के सबसे बड़े केंद्र, हमारे पवित्र मंदिर और देवालय, कथित रूप से वित्तीय अनियमितताओं, राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अखाड़े बनते जा रहे हैं।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के संदर्भ में भूमि सौदों पर उठे सवाल हों, केदारनाथ के गर्भगृह में सोने की परत को लेकर उपजा विवाद हो, या बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति द्वारा भक्तों के चढ़ावे का कथित तौर पर राजनीतिक रसूखदारों की खातिरदारी में दुरुपयोग; ये घटनाएं केवल प्रशासनिक चूक नहीं हैं। ये हमारी सामूहिक चेतना और सनातन संस्कृति पर गहरा आघात हैं।
व्यवस्थागत क्षरण: कौन हैं इसके पीछे?
जब हम गहराई से विश्लेषण करते हैं तो इसके पीछे एक बेहद सुगठित और संवेदनहीन ‘नेक्सस’ (गठबंधन) दिखाई देता है। इसमें तीन मुख्य तत्व शामिल माने जा सकते हैं।
नौकरशाही और सरकारी नियंत्रण: स्वतंत्रता के बाद से ही देश के कई बड़े और समृद्ध मंदिरों का नियंत्रण सरकारों ने अपने हाथ में ले लिया। सरकारों ने देवालयों को राजस्व वसूली का जरिया बना लिया।
संवेदनहीन ट्रस्टी और बिचौलिए: कई मंदिरों के ट्रस्टों में ऐसे लोगों को जगह मिली जिनकी निष्ठा धर्म, शुचिता और सेवा के प्रति न होकर केवल सत्ता और संपत्ति के प्रति है।
व्यावसायिक गठजोड़: तिरुपति बालाजी के प्रसाद में मिलावट के हालिया विवादों से लेकर शिरडी और जगन्नाथ पुरी जैसे महान तीर्थों में जमीनों के हेरफेर तक, हर जगह कॉरपोरेट और स्थानीय भू-माफियाओं का एक खतरनाक जाल नजर आता है।
राजनीतिक वरदहस्त: सत्ता का संरक्षण
यह कड़वा सच है कि बिना राजनीतिक वरदहस्त के इतने बड़े पैमाने पर आस्था का व्यापार संभव नहीं है। किसी भी दल की सरकार हो, मंदिरों की समितियों का उपयोग राजनीतिक पुनर्वास के लिए किया जाता है। हारे हुए राजनेताओं या चहेते नौकरशाहों को इन समितियों का अध्यक्ष या सदस्य बना दिया जाता है।
परिणामस्वरूप, भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा से चढ़ाया गया एक-एक रुपया, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज कल्याण में लगना चाहिए था, वह वीआईपी संस्कृति को पोषित करने, नेताओं की अगवानी करने और चुनावी फंडिंग के गुप्त रास्तों को सुगम बनाने में खर्च होने लगता है।
जो लोग सत्ता और धन के मद में चूर होकर ईश्वर के घर को भी अपनी लोभ का केंद्र बना रहे हैं, वे इतिहास के सबसे बड़े सत्य को भूल रहे हैं। सनातन दर्शन में ‘कर्म का सिद्धांत’ अकाट्य है।
‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:।’
यानी जो धर्म का विनाश करता है, धर्म उसका विनाश कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदू समाज अपने मंदिरों के सरकारीकरण और राजनीतिकरण के विरुद्ध मुखर हो। यदि देवस्थानों को इन सफेदपोश लुटेरों से मुक्त नहीं कराया गया तो भावी पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

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