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गपशप : `थाली में सब्जी नहीं, महंगाई का तूफान परोसा जा रहा है!’

राजन पारकर

गर्मी, बारिश और बहानों के बीच आम आदमी की रसोई बनी महंगाई का अखाड़ा
कभी कहा जाता था कि ‘दाल-रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ’ लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि दाल-रोटी भी जेब देखकर घर में प्रवेश करती है। सब्जी मंडी में जाने वाला आम आदमी अब खरीदारी करने नहीं, बल्कि महंगाई का तमाशा देखने जाता है। दुकानदार भाव बताता है और ग्राहक अपनी जेब की हालत देखकर सब्जी को नमस्कार करके लौट आता है।
भिंडी, गोभी, गवार, बैंगन, करेला, आलू, हरे मटर, जिन सब्जियों ने कभी गरीब की थाली की इज्जत बचाई थी, आज वही सब्जियां अमीरों की सूची में शामिल होने की तैयारी कर रही हैं। ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में सब्जी खरीदने के लिए भी बैंक से लोन लेना पड़ेगा और शायद सब्जी वाला भी पूछेगा -‘वैâश देंगे या ईएमआई पर ले जाएंगे?’
मौसम विभाग ने ‘एल नीनो’ का नाम लिया और महंगाई ने जनता को ‘हीट वेव’ दे दी। देर से आया मानसून, बढ़ती गर्मी और घटता उत्पादन, इन सबका बोझ सीधे आम आदमी की थाली पर गिरा है। किसान की चिंता अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि हर बार मौसम की मार का बिल जनता की जेब पर ही क्यों भेजा जाता है?
अंडे भी अब आम आदमी को आंख दिखाने लगे हैं। कुछ दिन पहले जो अंडे ७४ से ८० रुपये दर्जन तक आ गए थे, वे फिर ९० से ९६ रुपये दर्जन तक पहुंच गए। लगता है मुर्गियां भी महंगाई की खबरें सुनकर अपने अंडों के दाम तय कर रही हैं!
सब्जी मंडी का हाल देखिए- गोभी, घेवड़ा, भिंडी और दुधी जैसे सामान्य समझे जाने वाले सामान १०० से १२० रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। कुछ सब्जियां तो १६० से २०० रुपए किलो तक बिक रही हैं। टमाटर ६० रुपए किलो, धनिया की छोटी-सी गड्डी भी जेब पर हमला कर रही है।
कभी धनिया मुफ्त में मिलने पर ग्राहक मुस्कुराता था, आज धनिया भी ऐसे बिक रहा है, जैसे कोई कीमती गहना हो। रसोई में इस्तेमाल होने वाला लहसुन और अदरक भी अपने भाव से जनता को आंखें दिखा रहे हैं। ऊपर से व्यावसायिक एलपीजी सिलिंडर महंगा हो गया। होटल वालों ने खर्च बढ़ाया तो बाहर का खाना महंगा, घर में सब्जी महंगी तो अंदर का खाना महंगा।
यानी आम आदमी जाए तो जाए कहां?
महंगाई की यह कहानी भी बड़ी अजीब है- सरकार मौसम को दोष देती है, मौसम बादलों को दोष देता है, बादल हवा को दोष देते हैं और आखिर में जनता अपनी खाली जेब को दोष देती है। आज देश का आम आदमी ऐसी थाली लेकर बैठा है जिसमें रोटी तो है, लेकिन सब्जी के लिए बजट का भाषण देना पड़ता है। चुनावों में गरीब की थाली की चिंता करने वाले नेता अब शायद थाली की जगह उसकी फोटो देखकर ही संतोष कर रहे हैं। क्योंकि महंगाई ने साबित कर दिया है – ‘जिस देश में कभी सब्जी काटते समय आंखों में आंसू आते थे, आज उसी देश में सब्जी खरीदते समय आंखों में आंसू आ रहे हैं!’

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