मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय :  शाह की ‘झुंड पाठशाला'...प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी

संपादकीय :  शाह की ‘झुंड पाठशाला’…प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी

अमित शाह काफी समय से देश के गृहमंत्री हैं। यह उनकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भाग्य है। देश के लिए तो यह दुर्भाग्य है। इन्हीं अमित शाह ने कल कोल्हापुर में कहा कि, ‘यह देश कोई ‘धर्मशाला’ नहीं है। यहां केवल इसी देश में पैदा हुए लोग रहेंगे।’ शाह ने यह भी कहा कि, ‘हम देशभर से एक-एक घुसपैठिए को ढूंढ़कर बाहर निकालेंगे।’ शाह ने अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है, लेकिन यह सब प्रत्यक्ष रूप से अमल में कब आएगा? देश धर्मशाला नहीं है। कोई भी आता है और अपना बिस्तरा फैलाकर रहने लगता है। न कोई नियम है, न कोई कानून। अवैध रूप से रहना और गंदगी फैलाना, इसे कोई भी मान्यता नहीं देगा। इसलिए शाह के इस रुख का समर्थन होना ही चाहिए। सवाल सिर्फ इतना है कि भारत ‘धर्मशाला’ बन गया है, यह तय करनेवाले अमित शाह कौन होते हैं? शाह कम से कम दो ‘टर्म’ से गृहमंत्री हैं और अगर देश धर्मशाला बना है तो इसके लिए पूरी तरह से गृहमंत्री ही जिम्मेदार हैं। मोदी बारह साल से प्रधानमंत्री हैं। इन बारह वर्षों में सीमा पार करके जो घुसपैठिये भारत में आए, उनकी संख्या लाखों में है तो क्या देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था जिनके हाथों में है, वे अमित शाह सिर्फ दूसरों की पार्टियां तोड़ने में ही व्यस्त रहे? अमित शाह का निशाना बांग्लादेशियों पर है और वह सही भी है। ये बांग्लादेशी पिछले दस-बारह वर्षों में बड़ी संख्या में भारत आए। क्या इस घुसपैठ की जिम्मेदारी केंद्र के गृह मंत्रालय की नहीं है? अमित शाह के कहे अनुसार अगर हम यह मान लें कि हमारे देश में केवल भारत में ही पैदा हुए लोग रहेंगे तो बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को उनके परिवार सहित भारत में राजाश्रय किसने दिया है? प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह ने ही यह आश्रय दिया है। शाह कहते हैं, ‘देशभर से
प्रत्येक घुसपैठिये को
ढूंढ़कर बाहर निकालेंगे।’ पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, कश्मीर घाटी में जब भी कोई चुनाव आता है तो भाजपा द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उछाल दिया जाता है और ऐसा रौब दिखाया जाता है मानो राष्ट्र के भविष्य की चिंता सिर्फ उन्हीं को है। पिछले बारह वर्षों में कितने घुसपैठियों को सीमा के बाहर खदेड़ा गया, यह गृहमंत्री शाह नहीं बता पाएंगे। जम्मू के शरणार्थी शिविरों में रहनेवाले कश्मीरी पंडितों को उनके ‘घर’ यानी अनंतनाग, श्रीनगर, सोनमर्ग, गुलमर्ग जैसी जगहों पर सरकार आज तक सुरक्षित नहीं पहुंचा सकी है। सच तो यह है कि गृहमंत्री शाह के ही कार्यकाल में घुसपैठिये आए और पुलवामा में विस्फोट करके ४० भारतीय जवानों की हत्या कर गए। शाह के ही कार्यकाल में दोबारा घुसपैठिये आतंकवादी आए और पहलगाम में २६ हिंदू पर्यटकों पर गोलीबारी करके उन्हें मार डाला यानी आतंकवादी कांग्रेस की नहीं, बल्कि भाजपा की ही गोद में बैठे हैं और सरकार उनका बाल भी बांका नहीं कर सकी है। देश की जनता आपसे हिसाब मांग रही है कि आपने अपने बारह साल के शासनकाल में क्या किया। मूल रूप से गोधरा कांड के जघन्य पुण्य पर सत्ता में आई यह सरकार विचार और कर्म से अघोरी है। मणिपुर जल रहा है। आदिवासियों के दो गुटों में कलह भड़क उठी है। गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर को लेकर चिंता करते हुए कभी नहीं दिखे। मणिपुर में कांग्रेस का शासन नहीं, बल्कि भाजपा की ही सरकार है। मणिपुर में आए दिन महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन गृहमंत्री क्षेत्रीय पार्टियां तोड़कर ‘चीयर्स’ कर रहे हैं। शाह का कहना है कि कोल्हापुर के अंबाबाई मंदिर का जैसा विकास होना चाहिए था, वैसा स्थानीय स्तर पर नहीं हुआ है। शाह साहब, मंदिर का विकास का मतलब
भगवान की दानपेटियों पर डकैती
यह देश ने अयोध्या के राम मंदिर में अब देख लिया है। राम मंदिर का दान, सोना, चांदी, गहने सीधे लूट लिए गए। कारसेवकों ने राम मंदिर के लिए खून बहाया, शहादत दी और भाजपा वालों ने उसी मंदिर को लूट लिया। गजनी के महमूद ने जैसे सोमनाथ को लूटा, वैसे ही भाजपा ने राम मंदिर को लूटा। जरा इस पर भी बोलिए। अंबाबाई मंदिर में कम से कम ऐसी चोरियां-मक्कारियां तो नहीं हुई हैं। अयोध्या में दानपेटी पर डकैती कानून-व्यवस्था का दिवाला निकलना है। राम मंदिर की सुरक्षा तो कर नहीं पाते और चले हमारे अंबाबाई मंदिर का विकास करने। देश के कई प्रमुख मंदिरों की लूट पिछले दस वर्षों में हुई और ये सभी लुटेरे भाजपा में और श्रीमान अमित शाह की ही गोद में बैठे दिखाई देते हैं। शाह कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी की गोद में उद्धव ठाकरे बैठे हैं और वह पार्टी घुसपैठियों को ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल कर अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहती है। यह उनकी महाराष्ट्र-विरोधी उल्टी (अहंकार की बदबू) है। ये खुद राम मंदिर के डकैत हैं, लोकतंत्र के हत्यारे हैं। स्वतंत्रता संग्राम में जिनका कोई योगदान नहीं रहा, वे लोग ‘ठाकरे’ की तरफ उंगली उठाते हैं। यह शाह के मानसिक संतुलन बिगड़ने का लक्षण है। अमित शाह के दिमाग को फालिज मारने का एक और लक्षण यह है कि कोल्हापुर में उन्होंने ‘मिंधे’ को शिवसेनाप्रमुख घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में जब शिवसेना का मुकदमा चल रहा है, तब गृहमंत्री खुद ही फैसला सुना देते हैं कि शिवसेना किसकी है। यह न्याय व्यवस्था में शाह की घुसपैठ है। शाह को प्रधानमंत्री बनने की जल्दी मची है और वह मिंधे जैसे झुंडों की मदद से मोदी को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। मोदी को अब सावधान हो जाना चाहिए।

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