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फलसफा : सवाल उससे क्यों?

सना खान

एक लड़की देर शाम अपने घर लौट रही थी। पूरे रास्ते उसके मन में वही डर था, जो इस देश की अनगिनत लड़कियों के मन में अक्सर होता है-सुरक्षित घर पहुंचने का डर।
कुछ दिनों बाद उसके साथ एक भयानक अपराध हुआ। खबर पूरे गांव में पैâल गई। लोग दुखी भी थे, गुस्से में भी। लेकिन जल्द ही सवाल शुरू हो गए।
‘वह इतनी देर से बाहर क्यों थी?’
‘वहां गई ही क्यों थी?’
‘उसने ऐसा पहनावा क्यों पहना था?’
लड़की दर्द से लड़ रही थी, लेकिन समाज उसके जख्मों पर मरहम रखने के बजाय उससे ही जवाब मांग रहा था।
एक बुजुर्ग शिक्षक यह सब सुन रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा,
‘जब किसी का घर लूटा जाता है, तो हम चोर से सवाल करते हैं, घर के मालिक से नहीं। फिर ऐसे अपराधों में सवाल पीड़ित से क्यों किए जाते हैं?’
शिक्षक की बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। क्योंकि सच यही था कि अपराध का दोष कभी पीड़ित का नहीं होता।
फलसफा यही है कि किसी भी अपराध की जिम्मेदारी अपराधी की होती है, पीड़ित की नहीं। एक सभ्य समाज की पहचान उसके सवालों से नहीं, बल्कि उसके समर्थन, संवेदना और न्याय से होती है।
दर्द उसका था, मगर कटघरे में वही खड़ी रही, गलती किसी और की थी, मगर सफाई वही देती रही।
अजीब रिवाज हैं इस दुनिया की कहानी में, जख्म उसके थे, मगर इल्जाम उसी पर लगते रहे।

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