मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिपुस्तक समीक्षा: ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’ भाग्य की राजधानी का 4 डी चित्र

पुस्तक समीक्षा: ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’ भाग्य की राजधानी का 4 डी चित्र

डॉ. जरनैल सिंह आनंद

बालासाहेब लबडे एक प्रतिष्ठित कवि, समीक्षक, कथाकार, उपन्यासकार, गीतकार और संपादक हैं। उनकी बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है। एक कवि के रूप में बाळासाहेब लबडे असाधारण काव्य-संवेदना के धनी हैं। उनकी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय उनकी पूर्ववर्ती कृति ‘शेवटची लोककथा’ (अंतिम लोककथा) में भी मिलता है। उनकी नवीनतम मराठी कृति ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’, जिसका हिंदी अनुवाद भारत वेडे ने किया है, उनकी काव्य-दृष्टि और जीवन-बोध को महाकाव्यात्मक विस्तार प्रदान करती है।
यह कृति केवल किसी शहर का श्वेत-श्याम वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके आत्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की गहन पड़ताल करती है। लेखक अपने विषय के चारों ओर घूमते हुए उसके बहुआयामी अस्तित्व को एक प्रकार के ‘4 डी चित्र’ में प्रस्तुत करता है। पाठक को ऐसा अनुभव होता है, मानो वह स्वयं इस महानगर की रहस्यमय विराटता के भीतर विचरण कर रहा हो। यह पुस्तक मुंबई जैसे महानगर की संपूर्ण अनुभूति कराती है—एक ऐसा शहर, जिसने समय-समय पर अनेक परिवर्तन देखे हैं और व्यापार, कला तथा संस्कृति के क्षेत्र में परिवर्तन की तरंगों को सबसे पहले आत्मसात कर उन्हें पूरे देश में प्रसारित किया है।
कवि के लिए मुंबई एक आधुनिक रहस्य है। जितना अधिक उसमें उतरते हैं, उतनी ही उसकी जटिलता और गहराई बढ़ती जाती है। वह पाठक को निरंतर विस्मित करती है। मुंबई केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता है। यह केवल गगनचुंबी इमारतों का समूह नहीं, बल्कि समुद्र, धरती और आकाश का संगम है। यह वैश्विक संस्कृति का सूक्ष्म केंद्र है, जहाँ दृश्य और अदृश्य—दोनों संसारों का मिलन होता है। यहाँ एक ओर आधुनिक जीवन की चमक है, तो दूसरी ओर अंडरवर्ल्ड का अंधकार भी।
पुस्तक में मुंबई के भौतिक दृश्यों का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। कवि की भाषा इतनी सजीव और संवेदनात्मक है कि पाठक स्वयं को शहर की गलियों, सड़कों और समुद्री किनारों पर चलता हुआ महसूस करता है। लेकिन यह चित्रण केवल रोमानी नहीं है। लेखक जीवन के धूसर और अंधकारमय पक्षों को भी समान संवेदनशीलता के साथ सामने लाता है।
मुंबई का रहस्यलोक
मुंबई की सबसे बड़ी विशेषता उसका रहस्यलोक है। ऊँचे सपने देखने वाला युवा इसी आकर्षण से खिंचकर यहाँ आता है। यह अवसरों का शहर है, जहाँ व्यापार, फिल्म उद्योग और अंडरवर्ल्ड समानांतर रूप से उपस्थित हैं। स्वयं कवि लिखते हैं कि “मुंबई मेरे लिए एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है; एक महामाया, सपनों का नगर, रोशनी का शहर और एक विराट मिथक।”
वे मुंबई को “जीवित कोलाज” कहते हैं, जिसमें अनगिनत जातियाँ, धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ विद्यमान हैं। उनके अनुसार, यह “मिनी इंडिया” और “मिनी वर्ल्ड” है, क्योंकि इसका चरित्र पूरी तरह विश्वनागरिक है। कवि को यह शहर एक साथ हजारों चेहरों वाला और फिर भी चेहराविहीन प्रतीत होता है। प्रत्येक चेहरा अपने भीतर संघर्ष, पीड़ा, हानि और आनंद की एक अनकही कहानी छिपाए हुए है।
अनुवाद: एक आत्मिक यात्रा
अनुवादक भारत वेडे के अनुसार, इस कृति का हिंदी रूपांतरण “महानगर की आत्मा की यात्रा” जैसा अनुभव था। वे मानते हैं कि ये कविताएँ केवल शहर के विभिन्न स्थलों का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचती हैं। इनमें प्रवासी मजदूरों की टूटती हुई ज़िंदगी, कमाठीपुरा की दर्दभरी रातें, हाजी अली की आरती, लोकल ट्रेनों की धक्का-मुक्की और समुद्र की बेचैनी जैसी अनेक अनुभूतियाँ जीवंत हो उठती हैं।
भारत वेडे का कहना है कि कई बार भावनाएँ इतनी तीव्र गति से प्रवाहित होती थीं कि शब्द उन्हें व्यक्त करने में पीछे छूट जाते थे। यही इस कृति की भावनात्मक शक्ति है।
एक काव्यात्मक दस्तावेज
विमलेश त्रिपाठी के अनुसार, यह पुस्तक एक “काव्यात्मक डॉक्यूमेंट्री” है, जिसमें मुंबई की जटिल और विरोधाभासी यात्रा का चित्रण है। यहाँ औपनिवेशिक विरासत, पूँजीवादी विस्तार, श्रम संस्कृति, विस्थापन, धार्मिक आस्था, स्थापत्य कला और वैश्वीकरण की शक्तियाँ निरंतर टकराती दिखाई देती हैं।
इस महत्त्वपूर्ण काव्य-कृति के केंद्र में वह शहर है, जो भारत के आर्थिक सपनों का प्रतीक भी है और उसकी गहरी सामाजिक विषमताओं का साक्षी भी।
निष्कर्ष
इस पुस्तक का अध्ययन करते हुए यह अनुभव होता है कि प्रत्येक बड़े शहर को ऐसी ही एक काव्यात्मक कृति मिलनी चाहिए, जो उसकी आत्मा, उसके रहस्यों और उसके जीवन-संघर्षों को शब्द दे सके। कोई शहर केवल इमारतों का समूह नहीं होता और समाज केवल साथ रहने वाले लोगों का समुदाय नहीं होता। वास्तविक जीवन उस संस्कृति, संघर्ष, प्रकाश और अंधकार में बसता है, जो मानव अस्तित्व को आकार देते हैं।
बालासाहेब लबडे ने मुंबई जैसे विराट और जटिल महानगर को काव्य का विषय बनाकर एक चुनौतीपूर्ण कार्य किया है। उनकी सफलता इस बात में है कि मुंबई की गलियों, समुद्रों और भीड़ों से होकर बहती हुई कविता शहर के मूल जादू और रहस्य को अक्षुण्ण बनाए रखती है।

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