मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: एक्सीलेंसी के सामने झुकी गर्दन, छात्रों के बीच उठते सवाल

रुख-ए-सियासत: एक्सीलेंसी के सामने झुकी गर्दन, छात्रों के बीच उठते सवाल

तौसीफ कुरैशी

भारतीय राजनीति का एक विचित्र दृश्य इन दिनों एक साथ दिखाई दे रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दुनिया के बड़े नेताओं से मिल रहे हैं, दूसरी ओर विपक्ष के नेता जननायक राहुल गांधी देश के छात्रों के बीच जाकर शिक्षा और रोजगार के सवाल उठा रहे हैं। दोनों तस्वीरें अपने-अपने राजनीतिक संदेश देती हैं। प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करने वाले कहते हैं कि वे देश के भीतर तो बेहद शक्तिशाली और निर्णायक नेता के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन वैश्विक शक्तियों के सामने उनकी भाषा और व्यवहार अपेक्षाकृत नरम हो जाता है। आलोचकों का मानना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकात के दौरान उन्होंने भारतीय जहाजियों की मौत जैसे संवेदनशील मुद्दों को पर्याप्त मजबूती से नहीं उठाया, सही बात है उठाया भी नहीं। यह वही विपक्ष है जिसे अक्सर भाजपा और उसके समर्थक विदेशों में भारत की छवि खराब करने का आरोप लगाते रहे हैं। उधर राहुल गांधी ने अपने छात्र संवाद अभियान की शुरुआत राजस्थान के कोटा से की है अपार जनसमूह था। कोटा, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, लंबे समय से छात्रों पर बढ़ते आर्थिक और मानसिक दबाव का प्रतीक भी बन चुका है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर शिक्षा को एक महंगी व्यवस्था में बदल दिया गया है, जहां परिवार अपनी जीवन भर की जमा पूंजी बच्चों के भविष्य पर खर्च कर देते हैं, लेकिन रोजगार की कोई गारंटी नहीं मिलती। उन्होंने नीट परीक्षा, पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्याओं और बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। उनका दावा था कि नीट की तैयारी और परीक्षा प्रक्रिया पर देश के परिवार जितना खर्च करते हैं, वह भारत के शिक्षा बजट के बराबर बैठता है। यह आंकड़ा भले राजनीतिक बहस का विषय बने, लेकिन शिक्षा की बढ़ती लागत और रोजगार की अनिश्चितता आज करोड़ों परिवारों की वास्तविक चिंता है। २१ जून को हुई नीट पुनर्परीक्षा के बाद कांग्रेस प्रयागराज, पटना और दिल्ली में भी ऐसे सम्मेलन आयोजित करने जा रही है। साफ है कि विपक्ष आने वाले समय में शिक्षा और रोजगार को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश करेगा।
आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सत्ता की ताकत किसके लिए इस्तेमाल हो रही है। महाशक्तियों के सामने शिष्टाचार निभाने के लिए या अपने युवाओं के भविष्य की लड़ाई लड़ने के लिए।
यही बहस आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है। धार्मिक नशे की अफीम चटाकर सत्ता हथियाई जा सकती है, चलाई नहीं जा सकती और वही हो रहा है। चारों ओर बहुत निराशा है, लेकिन भाजपा और उसका नेतृत्व ऐसे हालात में भी लगा है क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ने में। कमाल की बात यह कि इन क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को कमजोर करने के लिए अपनी पीठ पर बैठाकर भाजपा को मजबूत किया और आज भी क्षेत्रीय दलों के सहारे केंद्र की सत्ता का सुख भोग रही है और उन्हीं को निपटा रही है। बिहार में बेचारे स्वयंभू सुशासन बाबू पता ही नहीं कहां हैं। अब दूसरा नंबर आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू का है फिर लाल टोपी और कफ सिरप का है। समय रहते होशियार हो जाना चाहिए अगर सियासत में बचे रहना है। सत्यमेव जयते
३६२ का गणित और लोकतंत्र की बेचैनी
राजनीति में संख्याएं कभी सिर्फ संख्याएं नहीं होतीं। वे इरादों का आईना भी होती हैं। आज दिल्ली के गलियारों में एक संख्या बार-बार फुसफुसाई जा रही है ३६२। सवाल यह नहीं है कि यह संख्या कहां से आएगी, सवाल यह है कि इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है? बीते कुछ महीनों में जो घटनाएं सामने आई हैं, वे भारतीय लोकतंत्र के लिए साधारण नहीं हैं। पहले अपने द्वारा बनाए गए दल ‘आप’ के राज्यसभा सांसदों को तोड़ा गया, फिर बंगाल में सत्ता तक पहुंचाने में मदद करने वाली तृणमूल कांग्रेस के सांसदों में बगावत कराई गई। अब राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि सपा कंपनी और कांग्रेस के कुछ सांसद भी संपर्क में हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन अफवाहें भी तभी जन्म लेती हैं जब सत्ता के गलियारों में कोई बड़ी हलचल चल रही हो। परिसीमन का प्रश्न इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में दिखाई देता है। लोकसभा की सीटें बढ़ाने और नए राजनीतिक भूगोल को आकार देने की चर्चा तेज है। समर्थक इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का विस्तार बताते हैं। आलोचकों को इसमें राजनीतिक लाभ का गणित दिखाई देता है। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं होगा। लोकतंत्र में कानून संसद बनाती है, लेकिन संसद का नैतिक बल सिर्फ संख्या से नहीं आता। वह जनता के भरोसे से आता है। यदि सांसद दल बदलकर, दबाव में आकर या राजनीतिक प्रलोभनों के कारण बहुमत का हिस्सा बनते हैं, तो कानूनी वैधता भले मिल जाए, नैतिक वैधता पर प्रश्न खड़े होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा का संकट लगातार गहराता गया है। ३६२ का आंकड़ा आखिरकार सिर्फ एक संसदीय संख्या नहीं है। यह उस दिशा का संकेत है जिसमें भारतीय राजनीति बढ़ रही है। सवाल यह नहीं कि कितने सांसद इधर आएंगे या उधर जाएंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र मजबूत विपक्ष, स्वतंत्र राजनीतिक दलों और विविध आवाजों के साथ आगे बढ़ेगा या फिर एक ऐसी व्यवस्था की ओर जाएगा, जहां संख्या तो बहुत होगी। असल सवाल क्यों चाहिए ३६२ सांसद संसद में सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए जो विपक्ष की मजबूत रणनीति से सरकार सफल नहीं हो पायी थी। सरकार ने जनता को भ्रमित करने की भरपूर कोशिश का थीr कि विपक्ष महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ है। जबकि विपक्ष आरक्षण देने के खिलाफ नहीं है। आरक्षण देना चाहता है। पर सरकार की मक्कारी के खिलाफ है और वह होना भी चाहिए, सरकार विपक्ष की इस असहमति को पसंद नही कर रही इसलिए लगी है तोड़ फोड़ करने में लोकतंत्र की असली ताकत बहुमत में नहीं, बहुलता में होती है। और जब बहुलता सिमटने लगे, तब हर नागरिक को सजग हो जाना चाहिए। सत्यमेव जयते

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