मनमोहन सिंह
अयोध्या से एक ऐसी खबर आई है जिसने राम मंदिर के कुछ ‘विशेष’ सेवादारों के कलेजे पर सांप लोटा दिया है। अब तक प्रभु के दरबार में श्रद्धा तो असीमित थी, लेकिन दानपात्रों से निकलने वाली माया का हिसाब थोड़ा ‘सीमित’ रह जाता था। भक्त तो बेचारा भाव-विभोर होकर सोने की चेन और करारे नोट चढ़ा जाता था, लेकिन गणना कक्ष तक पहुंचते-पहुंचते कुछ माया ‘अंतर्ध्यान’ हो जाती थी, यह तो स्वयं प्रभु या फिर नोट गिनने वाले वो जादुई हाथ ही जानते थे।
अब बीच में आ टपकी है एसआईटी। उसने सीधा हुक्म सुना दिया है, ‘वैâमरा रोलिंग, एक्शन!’ यानी दानपात्र खुलने से लेकर पैसे गिने जाने तक, हर सेकंड की फुल एचडी वीडियोग्राफी होगी।
बेचारे ‘सेवक’ अब सोच रहे होंगे कि कलयुग में सचमुच धर्म संकट आ गया है। पहले मंदिर परिसर में ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ की जो गुप्त और अघोषित परंपरा कुछ शातिर दिमागों ने बना रखी थी, उसपर वैâमरे की तीसरी आंख का पहरा लग गया है। अब न तो सोने का सिक्का जेब में सरक पाएगा और न ही नोटों की गड्डी गायब हो पाएगी। पारदर्शिता का यह भूत तो सेवा की ‘अतिरिक्त मलाई’ पर ही डाका डाल गया!
अरे भैया, जब हॉन्गकॉन्ग में ‘शाओ गाई’ नाम का रोबोट अकेले दुकान संभाल सकता है, तो क्या पता कल को अयोध्या के गणना कक्ष में भी रोबोट तैनात हो जाएं? तब ये बेचारे दिल पर हाथ रखकर यही गाएंगे, ‘हमसे का भूल हुई, जो सजा हमका मिली!’ खैर, अब भक्तों की गाढ़ी कमाई और आस्था दोनों महफूज रहेगी, भले ही कुछ ‘सेवकों’ का हाजमा थोड़ा बिगड़ जाए।
राम के नाम पर क्या-क्या कांड होगा शायद तुलसीदास जी को इसका आभास हो गया होगा। इसलिए श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में उन्होंने काकभुशुंडि जी के मुंह से कलयुग के पाखंडी ‘सेवकों’ और ‘साधुओं’ के लक्षण बताए हैं! उसका सार कुछ ऐसा है….
कलयुग में जो लोग प्रपंच पाखंड और कपट में डूबे रहेंगे, वे धर्म की केवल ‘ध्वजा’ उठाएंगे मतलब दिखावा करेंगे। जो दूसरों के धन को हरते हैं यानी चोरी या बेईमानी करते हैं और विकारों में लिप्त रहते हैं, वे कलयुग के पाखंडी साधु/सेवक हैं।
यह हम नहीं कह रहे तुलसीदास जी कह गए हैं… प्रणाम… जय श्री राम!
