मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ :  विदेश यात्राएं, निवेश और जनता का सवाल... आखिर देश को...

तीर-ए-तौसीफ :  विदेश यात्राएं, निवेश और जनता का सवाल… आखिर देश को मिला क्या?

तौसीफ कुरैशी

कभी-कभी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न वही होता है, जिसे पूछने से सत्ता असहज हो जाती है। हमारे समय का एक ऐसा ही प्रश्न है- प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से देश को वास्तव में क्या लाभ हुआ?
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति को अभूतपूर्व सक्रियता का नाम दिया गया। दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर भारत की उपस्थिति बढ़ी होना दर्शाया गया, जबकि यह सच नहीं था। मीडिया ने इस झूठ को बड़ी खूबसूरती से जनता को परोसा, अनेक देशों के साथ समझौते हुए, तस्वीरें खिंचीं, स्वागत समारोह हुए और यह संदेश दिया गया कि भारत विश्व राजनीति के केंद्र में पहुंच रहा है। लेकिन लोकतंत्र में केवल छवि ही पर्याप्त नहीं होती, उसके परिणाम भी दिखाई देने चाहिए। देश का सामान्य नागरिक यह जानना चाहता है कि जिन विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपए खर्च हुए, उनसे भारत में कितना निवेश आया? कितनी नई पैâक्ट्रियां लगीं? कितने युवाओं को रोजगार मिला? कितनी विदेशी कंपनियों ने भारत में उत्पादन इकाइयां स्थापित कीं? और यदि निवेश आया तो उसका लाभ किन क्षेत्रों और किन वर्गों तक पहुंचा? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश आज भी बेरोजगारी, महंगाई और आय असमानता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यदि विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य राष्ट्रीय हित और नागरिक कल्याण है, तो उसकी सफलता का मूल्यांकन भी इन्हीं कसौटियों पर होना चाहिए।
सरकार अक्सर विभिन्न समझौतों, निवेश प्रस्तावों और रणनीतिक साझेदारियों का उल्लेख करती है, लेकिन प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में अंतर होता है। अनेक बार अरबों डॉलर के निवेश की घोषणाएं होती हैं, परंतु वर्षों बाद भी उनका पूरा क्रियान्वयन नहीं हो पाता। इसलिए जनता को केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि उनका लेखा-जोखा चाहिए। अब १२ साल हो गए हैं। जुमलों के खेल से कुछ होने वाला नहीं है। भैंस खोल ले जाएंगे, इससे भी काम नहीं चलेगा क्योंकि कमरतोड़ महंगाई वह पहले ही ले गई। फलां का नंबर ही नहीं आया। दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विदेश नीति का लाभ व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंचा है? यदि विदेशी निवेश आया भी है, तो क्या उससे छोटे और मध्यम उद्योग मजबूत हुए? क्या कृषि क्षेत्र को नई तकनीक और बाजार मिले? क्या युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार बढ़े? लोकतंत्र में उपलब्धियों का आकलन केवल सरकारी विज्ञापनों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आए बदलाव से होता है। इसी संदर्भ में पश्चिम एशिया की उथल-पुथल भी महत्वपूर्ण है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और लाखों प्रवासी भारतीयों का भविष्य इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ा हुआ है।
संघियों के फादरलैंड इंसानियत के दुश्मन, मासूमों के कातिल इजरायल, ईरान, सऊदी अरब, तुर्की और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि हमारी विदेश नीति में भी झोल है। वह भी संकीर्ण सोच से बनाई गई है। तेल की कीमतों में वृद्धि से लेकर व्यापारिक मार्गों में बाधा तक, हर संकट का बोझ अंतत: भारतीय उपभोक्ता पर पड़ता है। इसलिए जनता यह भी जानना चाहती है कि भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता का उपयोग राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किस सीमा तक किया है। क्या भारत केवल वैश्विक मंचों पर उपस्थिति दर्ज करा रहा है या वह उन संकटों में भी प्रभावी भूमिका निभा रहा है, जो सीधे उसके आर्थिक और सामरिक हितों को प्रभावित करते हैं? लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं होता। सवाल पूछना नागरिकता का सबसे बड़ा अधिकार है। यदि सरकार की विदेश नीति सफल है तो उसे आंकड़ों और तथ्यों के साथ जनता के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यदि निवेश आया है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि रोजगार सृजित हुए हैं तो उनके आंकड़े सामने आने चाहिए। यदि नई कंपनियां आई हैं तो उनकी सूची और उनके योगदान की जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।
आखिरकार, लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि सत्ता जनता को जवाब दे। विदेश यात्राएं, अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और वैश्विक मंचों पर भाषण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन उनकी अंतिम परीक्षा देश के गांव, नगरों और शहरों में होती है। वहां रहने वाला नागरिक यही पूछ रहा है कि देश की विदेश नीति से मेरे जीवन में क्या बदला? जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट और प्रमाणित उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह बहस जारी रहेगी। और शायद जारी रहनी भी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में प्रश्नों का जीवित रहना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। सत्यमेव जयते

अन्य समाचार