– कांग्रेस ने शिक्षा को अधिकार बनाया, भाजपा ने शिक्षा को कारोबार और पेपर लीक का शिकार बनाया-प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस
अनिल मिश्र / रांची
किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के सपनों में बसता है।” लेकिन आज भारत का युवा अपने सपनों को टूटते हुए देख रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों खपाने वाले लाखों छात्र आज एक ऐसे तंत्र के सामने खड़े हैं, जहां मेहनत से ज्यादा महत्व पेपर माफियाओं, भ्रष्ट नेटवर्क और सरकारी विफलताओं का हो गया है। यह स्थिति किसी एक परीक्षा या एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।पिछले बारह वर्षों में भाजपा सरकार ने “न्यू इंडिया”, “अमृतकाल” और “विश्वगुरु” जैसे बड़े-बड़े नारे दिए, लेकिन जब देश का युवा रोजगार और निष्पक्ष परीक्षा की मांग करता है, तो उसे केवल आश्वासन, जांच समितियां और नई तारीखें मिलती हैं। वास्तविकता यह है कि आज भारत का युवा बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों की त्रासदी झेल रहा है। साल 2014 से 2024 के बीच देश में लगभग 89 पेपर लीक के मामले सामने आए और 48 बार परीक्षाएं दोबारा आयोजित करनी पड़ीं। 2026 में भी ऐसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। NEET, NET, पुलिस भर्ती, शिक्षक नियुक्ति, रेलवे और विभिन्न राज्य स्तरीय परीक्षाओं में बार-बार सामने आए घोटालों ने युवाओं का भरोसा हिला दिया है। करोड़ों परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। कई माता-पिता कर्ज लेकर कोचिंग फीस भरते हैं। छात्र वर्षों तक घर-परिवार से दूर रहकर तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बाजार में बिक जाते हैं, तब केवल परीक्षा ही नहीं, बल्कि करोड़ों सपनों की हत्या होती है।सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित और संवेदनशील परीक्षाओं में भी पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश का प्रमुख माध्यम बन चुकी NEET परीक्षा विवादों के केंद्र में रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव, अनिश्चितता और लगातार बदलती परिस्थितियों ने हजारों छात्रों को मानसिक तनाव की ओर धकेला है। अनेक दुखद घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका है।लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल पेपर लीक का मामला नहीं, बल्कि उन संस्थाओं के व्यवस्थित क्षरण का परिणाम है जो देश की परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं का संचालन करती हैं। जब योग्यता और निष्पक्षता की जगह राजनीतिक निष्ठा को प्राथमिकता दी जाती है, तब संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खो देती हैं। यही कारण है कि आज युवा केवल सरकार की नीतियों पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है।भाजपा सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक यह रही है कि उसने हर बड़े घोटाले के बाद पहले इनकार किया, फिर दबाव बढ़ने पर सीमित कार्रवाई का दिखावा किया। पेपर लीक की घटनाओं में अक्सर छोटे लोगों की गिरफ्तारी होती है, लेकिन उन बड़े नेटवर्कों तक जांच नहीं पहुंचती जो इस पूरे कारोबार को संचालित करते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कहीं न कहीं सत्ता का संरक्षण इन माफियाओं को प्राप्त है।यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि देश पहले से ही बेरोजगारी की चुनौती का सामना कर रहा है। लाखों सरकारी पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। भर्ती प्रक्रियाएं या तो शुरू नहीं होतीं, या फिर अदालतों और घोटालों में उलझ जाती हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली भी अविश्वसनीय हो जाए, तो युवाओं में निराशा बढ़ना स्वाभाविक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकार युवाओं की इस पीड़ा को समझने के बजाय अक्सर उनके सवालों को राजनीतिक चश्मे से देखने लगती है।इसके विपरीत कांग्रेस का दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट रहा है कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकार है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में शिक्षा को सामाजिक न्याय और समान अवसर के उपकरण के रूप में देखा गया। शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) ने पहली बार देश के बच्चों को शिक्षा का कानूनी अधिकार प्रदान किया। सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, छात्रवृत्ति योजनाएं और मध्याह्न भोजन योजना के विस्तार ने लाखों गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा।इसी अवधि में देशभर में नए IIT, IIM, NIT, केंद्रीय विश्वविद्यालय और AIIMS की स्थापना या स्वीकृति दी गई। उद्देश्य स्पष्ट था-उच्च शिक्षा तक पहुंच को कुछ विशेष वर्गों तक सीमित रखने के बजाय समाज के हर वर्ग के लिए खोलना। कांग्रेस ने शिक्षा को सामाजिक सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना।दूसरी ओर, भाजपा शासनकाल में शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कई सकारात्मक बातें जरूर हैं, लेकिन नीति की सफलता केवल दस्तावेजों से नहीं, बल्कि संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होती है। स्वयं राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा पर GDP का 6 प्रतिशत सार्वजनिक निवेश करने की बात करती है, लेकिन यह लक्ष्य आज भी अधूरा है। शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश की कमी के कारण सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को अपेक्षित संसाधन नहीं मिल पा रहे हैं।आज स्थिति यह है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा धीरे-धीरे महंगी होती जा रही है। गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच पहले से अधिक कठिन हो गई है। यदि शिक्षा अवसर के बजाय आर्थिक क्षमता पर निर्भर होने लगे, तो सामाजिक न्याय की अवधारणा कमजोर पड़ जाएगी।कांग्रेस का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस सुधारों की आवश्यकता है। सबसे पहले, पेपर लीक और भर्ती घोटालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसके लिए सर्वोच्च न्यायिक निगरानी में जांच कराई जानी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया जाना चाहिए। दूसरा, परीक्षा सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र और आधुनिक राष्ट्रीय तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जो तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर जवाबदेही सुनिश्चित करे। तीसरा, शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाकर कम-से-कम GDP का 6 प्रतिशत किया जाना चाहिए। चौथा, सभी रिक्त शिक्षक पदों और सरकारी नौकरियों में समयबद्ध नियुक्तियां सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इसके अलावा, पेपर लीक को संगठित अपराध की श्रेणी में लाकर दोषियों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए। जिन छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है, उन्हें मानसिक और आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए। सरकार का दायित्व केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि छात्रों के विश्वास की रक्षा करना भी है।आज भारत का युवा किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा है। वह केवल निष्पक्ष अवसर, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और अपनी मेहनत का सम्मान चाहता है। लेकिन जब बार-बार पेपर लीक होते हैं, भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लटकती हैं और सरकार जवाबदेही से बचती है, तब युवाओं का विश्वास टूटता है। किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ी चिंता की बात नहीं हो सकती।भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यदि यही युवा व्यवस्था से निराश हो गया, तो इसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर भी पड़ेगा। इसलिए शिक्षा और रोजगार का प्रश्न केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय है।आज समय की मांग है कि शिक्षा को बाजार नहीं, अधिकार माना जाए; परीक्षा को कारोबार नहीं, प्रतिभा की कसौटी बनाया जाए; और युवाओं को आंकड़ों का हिस्सा नहीं, राष्ट्र निर्माण का भागीदार समझा जाए।कांग्रेस ने शिक्षा को अधिकार बनाकर करोड़ों गरीब बच्चों के लिए अवसरों के दरवाजे खोले थे। आज आवश्यकता है कि उसी भावना को फिर से मजबूत किया जाए। क्योंकि मजबूत भारत की नींव मजबूत शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के सुरक्षित भविष्य पर ही टिक सकती है।देश का युवा पूछ रहा है-मेहनत मेरी, सपने मेरे, संघर्ष मेरा, तो फिर बार-बार सजा मुझे ही क्यों? इस सवाल का जवाब सरकार को देना होगा। क्योंकि युवाओं के भविष्य की रक्षा करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का सबसे बड़ा दायित्व है और उससे भागना इतिहास कभी माफ नहीं करता।
