-पदमाकर नांडेकर फैमली की मांग…गृहविभाग ले जवाबदेही
सामना संवाददाता / मुंबई
देशभर में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच मुंबई में सामने आए एक अंतरराष्ट्रीय “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड मामले ने मुंबई पुलिस और राज्य गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया की सबसे तेज मुंबई पुलिस की तुलना स्कोटलैंड पुलिस से की जाती हैं, लेकिन यही मुंबई पुलिस पिछले 5 वर्षों से भ्रष्टाचार और लापरवाही के चलते पिछड़ती जा रही है। आज टॉप टेन में भी नहीं है। इससे तेज तो दुबई पुलिस है। जी हां जिस सायबर ठगी के शिकार दुबई पुलिस दो दिन में पकड़ लेती है और ठगी की रकम भी बरामद कर लेती है। उस मामले में मुम्बई पुलिस एक्सल बाल भी कुछ समझ नहीं पा रही है।
मुंबई के कफ परेड निवासी डॉ. पद्माकर नांदेकर के परिवार से करीब 30 लाख रुपये की एक साल पहले साइबर ठगी हुई। मामले में कफ परेड पुलिस थाने में वर्ष 2025 में एफआईआर क्रमांक 0251/2025 दर्ज की गई थी। इसी ठग ने दुबई में भी डॉ. नांदेकर के भाई को निशाना बनाया गया था। दुबई पुलिस ने मामले की गहन जांच करते हुए बैंकिंग लेन-देन, डिजिटल ट्रेल और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों में एक भारतीय नागरिक और एक स्थानीय निवासी शामिल बताया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दुबई पुलिस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले साइबर गिरोह तक पहुंचने में सफल रही, तब मुंबई में दर्ज मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी?
पीड़ित परिवार डॉ पद्माकर नंदेकर का दावा है कि उनके पास आरोपियों के नाम, पासपोर्ट विवरण, बैंक खातों की जानकारी और लेनदेन संबंधी महत्वपूर्ण दस्तावेज मौजूद हैं, जो जांच एजेंसियों को सौंपे जा सकते हैं। इसके बावजूद मामले में प्रगति न होना जांच तंत्र की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
डॉ. पद्माकर नांदेकर ने कहा कि दुबई में हुई गिरफ्तारियों से स्पष्ट है कि साइबर अपराधियों तक पहुंचना संभव है, लेकिन भारत में जांच एजेंसियों की धीमी कार्यवाही के कारण पीड़ितों को न्याय और धनवापसी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। उन्होंने मांग की कि दुबई में गिरफ्तार आरोपियों के भारत स्थित संपर्कों, सहयोगियों और वित्तीय नेटवर्क की तत्काल जांच की जाए।
इस प्रकरण ने महाराष्ट्र के गृह विभाग और मुंबई पुलिस की साइबर अपराध जांच व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि विदेशी जांच एजेंसियां आरोपियों तक पहुंच सकती हैं, तो मुंबई में दर्ज मामले में अब तक उल्लेखनीय प्रगति क्यों नहीं हुई? यह सवाल अब केवल पीड़ित परिवार का नहीं, बल्कि बढ़ते साइबर अपराधों से चिंतित लाखों नागरिकों का भी है। पीड़ित परिवार ने महाराष्ट्र सरकार, गृह विभाग तथा साइबर अपराध जांच एजेंसियों से मांग की है कि दुबई पुलिस की तरह कार्रवाई में फुर्ती दिखाएं।
