वक्त-वक्त की बात है, भैया*
गुजरे वक्त को याद कर,
क्या आंसू बहाना? क्यों दम घुटाना?
ना कल लौट के आया है कभी,
ना ही ‘कल’ ‘कल’ कहलाएगा।
वो कल भी आज में तब्दील हो जाएगा।
जो भी कहना-करना है,
समय रहते आज कह-कर लो।
वक्त किसी का लिहाज नहीं करता है।
हमारा ‘आज’ ही हमारी ‘संपत्ति’ है।
आज ही हमारा भाग्य संवारेगा।
आओ, हम आज को संभालें, संवारें।
हमारा ‘स्वस्थ आज’ ही हमारे
‘उज्ज्वल भविष्य’ को ‘सुखद मुस्कान’ देगा।
कल की छोड़ो… हुई बात पुरानी।
ना ‘कल’ का सपना संजोकर, आज गंवाओ।
आओ, हम तबीयत से आज में जी लें।
आज ही जीवन/ज़िंदगी है।
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
