बहुत हो गए हैं!

हम अपराजेय हैं काल के आगे,
ऐसी सोच पालने वाले
बहुत हो गए हैं।

बेवक्त इंसान को ही नहीं,
भगवान को खरीदने वाले
बहुत-बहुत हो गए हैं।

दौलत का चश्मा चढ़ा,
भक्ति की चादर ओढ़,
स्वेटर, कंबल बांटने वाले
बहुत हो गए हैं।

कहते हैं, कानून अंधा होता है।
पता ही नहीं चला,
कब बलात्कारी रिहा हो गए हैं।

तमाशा दिखाने वाले,
तमाशा दिखाते-दिखाते
कब तमाशाई हो गए हैं।

देश कितने पायदान
आगे चढ़ गया।
अमीर बढ़ गए, पर
गरीब अधिक गरीब हो गए हैं।

बर्फबारी हो रही पहाड़ों पर,
तापमान गिर रहा।
फुटपाथ पर बेघर मजदूर
ठंड से सिकुड़ गए हैं।

उपले, लकड़ी जलती थी
सबके रसोईघर में।
हाथ-पांव सिक जाते थे।
गैस सिलेंडर आने से
घर ठंडे-ठार हो गए हैं।

चौराहों की लालबत्ती पर
भिखारी दिखें न दिखें,
चुनावों में वोट मांगने वाले
बहुत हो गए हैं।

एक कल बीत गया,
आने वाला कल किसने देखा।
हम आज के बादशाह हो गए हैं।

-बेला विरदी

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