जब एक सांसद संजय दीना-पाटील पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहते हैं, ‘मैंने तुम्हें खाना खिलाया!’ तो यह वाक्य पत्रकारिता और राजनीति के संबंधों पर एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यदि किसी चैनल के पत्रकारों, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों या राजनीतिक नेताओं से बार-बार भोजन, चाय-पानी, उपहार या अन्य प्रकार का आतिथ्य स्वीकार करते हैं तो क्या वे उनके सामने पूरी तरह निष्पक्ष और निर्भीक रह सकते हैं? एक इंसान के रूप में हम सभी किसी न किसी स्तर पर संबंधों और उपकारों का प्रभाव महसूस करते हैं। कोई व्यक्ति केवल एक कप चाय भी पिला दे, तो संभव है कि उसके प्रति हमारी भाषा थोड़ी नरम हो जाए। ऐसे में जब नियमित मुलाकातें, भोजन, निजी बैठकों और उपहारों का सिलसिला शुरू हो जाए, तो कड़े सवाल पूछने की धार कुंद पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पत्रकारिता की असली ताकत सत्ता को असहज करने वाले सवाल पूछने में है, न कि सत्ता से दोस्ती बढ़ाने या उसकी कृपा बनाए रखने में। पत्रकार का काम सत्ता के करीब जाना नहीं, बल्कि जनता के सवालों के साथ सत्ता के सामने खड़ा होना है। हाल के वर्षों में कई पत्रकारों ने सीधे राजनीति में प्रवेश किया है। कुछ ने खुलकर किसी राजनीतिक दल का रास्ता चुना, जबकि कुछ पत्रकारों को लेकर दर्शकों के मन में यह संदेह पैदा हुआ कि वे पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं या किसी राजनीतिक दल के दलाल प्रवक्ता के रूप में।
सोशल मीडिया पर उनकी प्रतिक्रियाएं, किसी विशेष नेता के प्रति दिखने वाली नरमी, उसकी गलतियों को छिपाने की कोशिश और विरोधियों के प्रति लगातार कठोर भाषा इस संदेह को और गहरा करती है। जब किसी पत्रकार की राजनीतिक पसंद उसकी हर खबर और हर सवाल में साफ दिखाई देने लगे तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। पत्रकारों और नेताओं के बीच अनौपचारिक संबंध केवल खबरों की भाषा और प्रस्तुति को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि कई बार राजनीतिक घटनाक्रम पर भी असर डाल सकते हैं। महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं के पीछे निजी मुलाकातों, रात्रिभोज, अनौपचारिक बैठकों और चर्चाओं का उल्लेख अक्सर सामने आता है। इसलिए पत्रकार और सत्ता के बीच आवश्यक पेशेवर दूरी बनाए रखना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि पत्रकारों को राजनीतिक नेताओं से संवाद नहीं करना चाहिए। सूचना प्राप्त करने के लिए संपर्क आवश्यक है। लेकिन संपर्क और नजदीकी, संवाद और मिलीभगत तथा पेशेवर संबंध और निजी एहसान के बीच की सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए।
सत्ताधारियों की आलोचना करना, उनके निर्णयों की जांच करना, उनसे जवाब मांगना और जनता की ओर से सवाल उठाना पत्रकार की मूल जिम्मेदारी है। यदि पत्रकार और राजनेता के बीच नजदीकी इतनी बढ़ जाए कि सवाल पूछने वाले और जवाब देने वाले के बीच की सीमा धुंधली हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता और लोकतंत्र का होता है। लिहाजा, अब हर पत्रकार को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए, उसे किसी नेता के भोजन का एहसान मानना है या जनता के विश्वास की जिम्मेदारी निभानी है?
