मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : सत्ता-बैंक-किसान के बीच महाराष्ट्र की राजनीति का नया त्रिकोण!

महाराष्ट्रनामा : सत्ता-बैंक-किसान के बीच महाराष्ट्र की राजनीति का नया त्रिकोण!

राजन पारकर

महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों ऐसा दृश्य दिखाई दे रहा है, मानो एक तरफ बैंक की तिजोरी में आरबीआई की घंटी बज रही हो, दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में कुर्सियों की रस्साकशी चल रही हो और तीसरी तरफ किसान अपने कर्ज की फाइल लेकर सरकारी दरवाजे पर खड़ा हो।
कभी ‘सहकार’ के नाम पर सत्ता का सहारा लेने वाले नेताओं से अब हिसाब मांगा जा रहा है, तो कभी महायुति के रिश्तों में कौन किसके हाथ में हाथ डालकर खड़ा है, इस पर राजनीतिक पंडित अपनी दूरबीन साफ कर रहे हैं। किसान के लिए सरकार कहती है कि बैंक सुधर जाएं, वरना सरकारी खाते भी दूसरी जगह चले जाएंगे।
महाराष्ट्र का यह नया राजनीतिक नाटक ऐसा है, जिसमें हर पात्र अपनी-अपनी पटकथा पढ़ रहा है, लेकिन जनता पूछ रही है, ‘साहब, अंत में फायदा किसका होगा?’
बैंक में गड़बड़ी की घंटी…आरबीआई की नोटिस की थाली!
सांगली जिला मध्यवर्ती बैंक के दरवाजे पर आरबीआई की नोटिस पहुंची तो सहकारिता के पुराने किले में हलचल मच गई। आरोप वही पुराने- कर्ज देने में नियमों की अनदेखी, कर्जमाफी में सवाल और व्यवस्था में गड़बड़ी।
अब हालत यह है कि जिन कुर्सियों पर बैठकर बैंक चलाए गए, उन्हीं कुर्सियों से जवाब मांगा जा रहा है। नेताओं के बयान भी ऐसे निकल रहे हैं, जैसे हर कोई बैंक का चौकीदार हो और चाबी किसी और के पास।
राजनीति का भी अजब खेल है- जब तक पैसा चलता है तब तक तालियां बजती हैं, लेकिन जब आरबीआई की चिट्ठी आती है तो हर कोई पूछता है- ‘चाबी किसके पास थी?’
महायुति की गाड़ी में कौन ड्राइवर और कौन यात्री?
उदय सामंत को लेकर शुरू हुई राजनीतिक खींचतान ने एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति की पुरानी आदत दिखा दी- दोस्ती भी सार्वजनिक, तंज भी सार्वजनिक।
किसी ने कहा कि फडणवीस का हाथ था, किसी ने कहा कि राजनीतिक मजबूरी थी। यानी राजनीति में हाथ पकड़ने का भी इतिहास लिखा जाता है और छोड़ने का भी।
सत्ता की सीढ़ी बड़ी विचित्र होती है- कल जिस सीढ़ी को कोई अपना सहारा बताता है, आज वही सीढ़ी किसके वजन से मजबूत हुई, इस पर बहस शुरू हो जाती है।
नेता बदलते हैं, गठबंधन बदलते हैं, लेकिन जनता का सवाल वही रहता है- ‘साहब, हमारी सीढ़ी कब मजबूत होगी?’
किसान का कर्ज, बैंक का डर और सरकार की चेतावनी!
किसान को फसल कर्ज देने में अगर बैंक आनाकानी करेंगे तो सरकार ने भी बैंक वालों को आईना दिखाने की तैयारी कर ली है।
कहा गया है कि किसानों को परेशान करने वाली बैंकों की सरकारी खाते दूसरी सक्षम बैंकों की तरफ मोड़े जा सकते हैं।
वाह रे व्यवस्था! किसान खेत में मेहनत करता है, बैंक फाइल में मेहनत करता है और सरकार बयान में मेहनत करती है। अब देखना यह है कि इस बार किसान की फसल बढ़ती है या सिर्फ घोषणाओं की पैदावार होती है।
‘महाराष्ट्र की राजनीति एक ऐसा रंगमंच बन चुकी है जहां बैंक नोटिस पढ़ रहे हैं, नेता बयान लिख रहे हैं और किसान उम्मीदों की फसल बो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी सबकी फसल टीवी पर उगती है, किसान की फसल खेत में!’

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