शीतल अवस्थी
नारदजी कहते हैं- श्री रामचंद्रजी पम्पा सरोवर पर जाकर सीता के लिए शोक करने लगे। वहां वे शबरी से मिले, फिर हनुमानजी से उनकी भेंट हुई। हनुमानजी उन्हें सुग्रीव के पास ले गए और सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता कराई। श्री रामचंद्रजी ने सबके देखते-देखते ताड़ के सात वृक्षों को एक ही बाण से बींध डाला और दुन्दुभि नामक दानव के विशाल शरीर को पैर की ठोकर से दस योजन दूर फेंक दिया। इसके बाद सुग्रीव के शत्रु बाली को, जो भाई होते हुए भी उनके साथ वैर रखता था, मार डाला और किष्किन्धापुरी, वानरों का साम्राज्य, रूमा एवं तारा-इन सबको ऋष्यमूक पर्वत पर वानर राज सुग्रीव के अधीन कर दिया। सुग्रीव ने कहा- ‘श्रीराम! आपको सीताजी की प्राप्ति जिस प्रकार भी हो सके, ऐसा उपाय मैं कर रहा हूँ।’ यह सुनने के बाद श्रीरामचंद्र जी ने माल्यवान पर्वत के शिखर पर वर्षा के चार महीने व्यतीत किए और सुग्रीव किष्किन्धा में रहने लगे। चौमासे के बाद भी जब सुग्रीव दिखाई नहीं दिए, तब श्रीरामचंद्रजी की आज्ञा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में जाकर कहा- ‘सुग्रीव! तुम श्रीरामचंद्र जी के पास चलो। अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहो, नहीं तो बाली मर-कर जिस मार्ग से गया है, वह मार्ग अभी बंद नहीं हुआ है। अतएव वाली के पथ का अनुसरण न करो।’ सुग्रीव ने कहा- ‘सुमित्रानन्दन! विषयभोग में आसक्त हो जाने के कारण मुझे बीते हुए समय का भान न रहा (अत: मेरे अपराध को क्षमा कीजिये)।’
ऐसा कहकर वानर राज सुग्रीव श्रीरामचंद्रजी के पास गये और उन्हें नमस्कार करके बोले- ‘भगवान! मैंने सब वानरों को बुला लिया है। अब आपकी इच्छा के अनुसार सीताजी की खोज करने के लिये उन्हें भेजूँगा। वे पूर्वादि दिशाओं में जाकर एक महीने तक सीताजी की खोज करें। जो एक महीने के बाद लौटेगा, उसे मैं मार डालूँगा।’ यह सुनकर बहुत-से वानर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं के मार्ग पर चल पड़े तथा वहाँ जनक कुमारी सीता को न पाकर नियत समय के भीतर श्रीराम और सुग्रीव के पास लौट आये। हनुमान जी श्रीरामचंद्रजी की दी हुई अँगूठी लेकर अन्य वानरों के साथ दक्षिण दिशा में जानकी जी की खोज कर रहे थे। वे लोग सुप्रभा की गुफ़ा के निकट विन्ध्यपर्वत पर ही एक मास से अधिक काल तक ढूँढ़ते फिरे; किंतु उन्हें सीता जी का दर्शन नहीं हुआ। अन्त में निराश होकर आपस में कहने लगे- ‘हम लोगों को व्यर्थ ही प्राण देने पड़ेंगे। धन्य है वह जटायु, जिसने सीता के लिये रावण के द्वारा मारा जाकर युद्ध में प्राण त्याग दिया था’। उनकी ये बातें सम्पाति नामक गृध्र के कानों में पड़ीं। वह वानरों के (प्राण त्याग की चर्चा से उनके) खाने की ताक में लगा था। किंतु जटायु की चर्चा सुनकर रूक गया और बोला- ‘वानरो! जटायु मेरा भाई था। वह मेरे ही साथ सूर्य मण्डल की ओर उड़ा चला जा रहा था। मैंने अपनी पाँखों की ओट में रखकर सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से उसे बचाया। अत: वह तो सकुशल बच गया; किंन्तु मेरी पाँखें चल गयीं, इसलिये मैं यहीं गिर पड़ा। आज श्रीरामचंद्र जी की वार्ता सुनने से फिर मेरे पंख निकल आये। अब मैं जानकी को देखता हूँ; वे लंका में अशोक-वाटिका के भीतर हैं। लवण समुद्र के द्वीप में त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। यहाँ से वहाँ तक का समुद्र सौ योजन विस्तृत है। यह जान कर सब वानर श्रीराम और सुग्रीव के पास जायें और उन्हें सब समाचार बता दें।
