मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष: अयोध्या को आस्था का बाजार न बनाया जाए!

विशेष: अयोध्या को आस्था का बाजार न बनाया जाए!

रमन मिश्र

बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों में आने वाले चढ़ावे, दान और बहुमूल्य संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी, वित्तीय अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई मामलों में ट्रस्ट के सदस्यों, स्थानीय नौकरशाहों और कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों की मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं।
मंदिर के पूर्व मुख्य लेखा प्रभारी महिपाल सिंह (जो जनवरी २०२१ से अप्रैल २०२२ तक कार्यरत थे) ने मीडिया के सामने आकर दावा किया कि दान की राशि की गिनती के दौरान हेराफेरी का एक संगठित खेल लंबे समय से चल रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने एक बार ५ लाख रुपए की चोरी पकड़ी और इसकी शिकायत ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से की, तो उन्हें ही पद से हटा दिया गया।
इस मामले की निष्पक्षता और गहराई से जांच के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है, जिसमें पूरे मामले की वैâग से जांच कराने और एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है।
यह पता लगना बहुत जरूरी है कि इस चोरी के तार प्रबंधन या ट्रस्ट के किन बड़े चेहरों से जुड़े हैं। करोड़ों रामभक्तों की आस्था से जुड़े होने के कारण इस रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्षों पर देशभर की निगाहें टिकी हैं।
राम मंदिर की लंबी कानूनी और सांस्कृतिक लड़ाई में निर्मोही अखाड़ा, रामानंद संप्रदाय और अयोध्या के स्थानीय स्थापित संतों (जैसे जगद्गुरु रामानंदाचार्य, दिगंबर अखाड़े के संत आदि) ने सदियों तक संघर्ष किया। ट्रस्ट के गठन के समय कई प्रमुख संतों को लगा कि उनके योगदान और पारंपरिक अधिकारों को दरकिनार कर दिया गया।
संतों का तर्क है कि ट्रस्ट में आईएएस अधिकारियों (पूर्व और वर्तमान), राजनेताओं और संघ से जुड़े व्यक्तियों का प्रभाव अधिक है। उनका मानना है कि जब किसी धार्मिक संस्था में सत्ताधारी प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक वर्ग का नियंत्रण बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो वहां की निर्णय प्रक्रिया में ‘आध्यात्मिक चेतना’ के बजाय ‘बाजार की विचारधारा’ हावी हो जाती है।
हाल ही में मंदिर के चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के जो आरोप सामने आए हैं, उन्हें लेकर कुछ संतों का कहना है कि यदि ट्रस्ट में अयोध्या के पारंपरिक, विरक्त और निष्पक्ष संतों का व्यापक नियंत्रण होता, तो शायद इस तरह की राजनीतिक और प्रशासनिक सांठगांठ पनप ही नहीं पाती।
वैचारिक रूप से देखा जाए तो संतों की यह चिंता जायज है कि धर्मस्थल का मूल चरित्र आध्यात्मिक होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक और प्रशासनिक इकाई।
जब ईश्वर के प्रति निश्छल श्रद्धा और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का घालमेल होने लगता है तो नुकसान किसी एक दल या व्यवस्था का नहीं, बल्कि समाज के उस नैतिक ताने-बाने का होता है जो सदियों के भरोसे पर टिका है। एक आम श्रद्धालु मंदिर, मस्जिद या किसी भी पवित्र स्थान पर अपनी व्यक्तिगत शांति, मुक्ति और समर्पण की भावना से जाता है। लेकिन जब इन स्थानों को चुनावी विमर्श (नेरेटिव) का मुख्य केंद्र बना दिया जाता है, तो श्रद्धा का यह एकांत और पवित्र रूप सामूहिक `वोट बैंक’ में तब्दील होने लगता है। राजनीति का स्वभाव ही विभाजन और ध्रुवीकरण है, जबकि धर्म का मूल स्वभाव जोड़ना और भीतर से शांत करना है। दोनों का यह टकराव अंतत: आस्था के मूल स्वरूप को ही चोट पहुंचाता है।
जैसा कि हाल ही में राम मंदिर के चढ़ावे की हेराफेरी के आरोपों और एसआईटी की जांच से सामने आया है, जब किसी धार्मिक संस्थान का नियंत्रण आध्यात्मिक चेतना वाले संतों या निष्पक्ष समाज के बजाय राजनीतिक और प्रशासनिक सांठगांठ के हाथों में चला जाता है, तो वहां `सेवा भाव’ की जगह `बाजार भाव’ हावी हो जाता है। जब तक राजनेता और नौकरशाह किसी धार्मिक स्थल को अपनी शक्ति के प्रदर्शन या नियंत्रण के साधन के रूप में देखेंगे, तब तक वहां पारदर्शिता की उम्मीद करना बेमानी होगा।
इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने धर्म का सहारा अपनी नाकामियों को छिपाने या जनता को तात्कालिक रूप से रिझाने के लिए किया है, तब-तब समाज का वास्तविक कल्याण अर्थात लोकमंगल पीछे छूट गया है। बुनियादी सवाल, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक अधिकार और सामाजिक समरसता, धार्मिक प्रतीकों के शोर में दबा दिए जाते हैं।
बुद्ध, कबीर, तुलसी और गांधी की इस भूमि पर धर्म हमेशा से सत्ता को मर्यादित करने और उसे नैतिक दायित्व यानी राजधर्म याद दिलाने का माध्यम रहा है। लेकिन आज की स्थिति इसके उलट दिखती है, जहां सत्ता स्वयं धर्म को अपनी सुविधानुसार संचालित और परिभाषित करने का प्रयास कर रही है। करोड़ों लोगों की निश्छल आस्था से खिलवाड़ को रोकने का एकमात्र रास्ता यही है कि नागरिक के तौर पर हम भी सजग हों, हम ईश्वर की शरण में श्रद्धा जरूर लेकर जाएं, लेकिन जब नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों की बात आए, तो प्रशासन और सत्ता से उनके हिस्से के तीखे सवाल पूछना न छोड़ें। आज एक सच्चे और देशभक्त संविधान प्रेमी नागरिक का यही सबसे बड़ा दायित्व है।
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