कविता श्रीवास्तव
सुप्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियां हैं– समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।। यह हिंदी साहित्य की वह प्रभावशाली पंक्तियां हैं, जो समाज को उसकी नैतिक जिम्मेदारी का एहसास कराती हैं। संदेश स्पष्ट है कि अन्याय केवल करने वाले तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह समाज भी जिम्मेदार होता है जो सब कुछ देखकर चुप रह जाता है। यह बात आज अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में हुए दान चोरी के मामले में बहुत ही सार्थक प्रतीत होती है। इस मामले में एक बहुत बड़ा वर्ग, ढेर सारे संगठन और ढेर सारे मुखर नेता, धर्माचार्य भी आज खामोश हैं, तटस्थ बने हुए हैं। दिनकर जी की पंक्तियों से समझें तो तटस्थता यानी खामोशी भी कई बार नैतिक अपराध बन जाती है। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर करोड़ों सनातनियों की आस्था, विश्वास और पहचान का केंद्र है। वहां चोरी, असामाजिक गतिविधि या सुरक्षा में चूक पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। ऐसे समय में सिर्फ घटना पर चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके खिलाफ स्पष्ट और सामूहिक आवाज उठाना भी जरूरी है। समाज में हर मुद्दे पर मुखर रहने वाले अनेक लोग क्यों चुप हैं? यह चुप्पी कई बार सवाल उठाती है। जनता भी समझती है कि कौन बोल रहा है और कौन सिर्फ दर्शक बना हुआ है। आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में यह स्पष्ट हो जाता है कि लोग किस मुद्दे पर बोलते हैं और किस पर चुप रहते हैं। आज का समाज जागरूक है और वह नेताओं, संगठनों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका को बारीकी से देखता है। बड़ी जनसंख्या से जुड़े विषय पर जनता अपेक्षा करती है कि सभी जिम्मेदार लोग स्पष्ट रूप से सामने आएं और न्याय, जांच तथा सुरक्षा को मजबूत करने की मांग करें। श्रीराम जन्मभूमि जैसे पवित्र स्थान पर दान की चोरी की घटना को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि समाज एकजुट होकर यह संदेश दे कि आस्था के केंद्रों पर किसी भी प्रकार की गलत हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मौन रहना समाधान नहीं है। लेकिन आवाज विवेकपूर्ण, तथ्यपरक और एकजुटता के साथ उठे। समाज की ताकत उसकी एकता और जागरूकता में होती है। जब समाज स्पष्ट रूप से खड़ा होता है, तभी गलत सोच रखने वालों को संदेश जाता है कि ऐसी घटनाएं स्वीकार नहीं की जाएंगी। देश के रचनाकारों ने हमेशा समाज को आईना दिखाया है कि न्याय और सत्य के लिए वक्त पर बोलना भी जरूरी है। सही समय पर सही आवाज उठानी चाहिए। क्योंकि जो खामोश रहते हैं, गलत को गलत कहने के लिए आगे नहीं आते हैं, समय उनका भी अपराध दर्ज करता है।
दिनकर जी ने ही लिखा है-
कह दो उनसे झुके अगर, तो जग में यश पाएंगे।
अड़े रहे अगर तो ऐरावत, पत्तों से बह जाएंगे।।
