सैयद सलमान / मुंबई
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करनेवाली ताकतों के इस दौर में, देश के सुदूर अंचलों से आने वाली कुछ तस्वीरें उम्मीद का एक नया क्षितिज खोलती हैं। हाल ही में राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर जैसे संवेदनशील सीमावर्ती जिलों में प्रशासनिक स्तर पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर जब कुछ मुस्लिम समाज के धार्मिक और शैक्षणिक स्थलों पर कार्रवाइयां शुरू हुईं, तो वहां के सामाजिक परिदृश्य ने एक अनोखी मिसाल पेश की।
साझी आवाज का संदेश
इस प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में सिर्फ एक समुदाय विशेष खड़ा नहीं हुआ, बल्कि ‘सर्व धर्म शांति सभा’ के बैनर तले हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही समुदायों के नागरिक कंधे से कंधा मिलाकर सड़कों पर उतरे। राजस्थान के तपते रेगिस्तान की इस साझी आवाज ने स्पष्ट संदेश दिया कि इस देश का आम नागरिक आज भी नफरत और विभाजन की राजनीति से बहुत ऊपर उठकर सोचता है।
इस घटना को महज एक तात्कालिक विरोध प्रदर्शन कहना उचित नहीं होगा। यह भारतीय समाज की उस अंतर्निहित चेतना का जीवंत प्रमाण है, जिसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ कहा जाता है। यह तहजीब किताबी पन्नों या चुनावी भाषणों की जागीर नहीं है। इसे मरुधरा की इस माटी में रची-बसी एक शाश्वत हकीकत कहना ज्यादा उचित होगा। ऐतिहासिक रूप से देखें तो इन सीमावर्ती क्षेत्रों में सूफी-संतों की विरासत और लोक-संस्कृति के प्रति दोनों समुदायों की साझा आस्था रही है। यही कारण है कि ग्रामीण भारत में सुख-दुख, न्याय-अन्याय और मानवीय सरोकारों को मजहबी चश्मे से नहीं देखा जाता। जब भी जनमानस को यह आभास होता है कि व्यवस्था या कानून का इस्तेमाल किसी एक वर्ग को लक्षित करने के लिए किया जा रहा है तो समाज का सामूहिक विवेक स्वत: जागृत हो उठता है। राजस्थान के इन सीमावर्ती गांवों ने सिद्ध किया है कि इंसानियत को सर्वोपरि रखने की यही सामूहिक जिजीविषा भारतीय लोकतंत्र की असली रीढ़ है।
नौजवानों की सोच और आत्मनिरीक्षण
इस मामले में युवाओं की बड़ी भूमिका रही। बदलते परिप्रेक्ष्य में, देश की युवा पीढ़ी पर अटूट विश्वास जताने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। आज का युवा सोशल मीडिया पर परोसी जाने वाली नफरत की वर्चुअल दुनिया और प्रायोजित बहस-मुबाहिसों से परे, धरातल की वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समझता है। वह इस विभाजनकारी राजनीति से पूरी तरह ऊब चुका है। समकालीन युवा वर्ग अपने भविष्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, स्टार्टअप और रोजगार के अवसरों को लेकर कहीं अधिक फिक्रमंद है। तार्किक सोच रखनेवाली यह नई पीढ़ी भली-भांति जानती है कि आंतरिक कलह और वैमनस्य के रास्ते पर चलकर कोई भी राष्ट्र वैश्विक महाशक्ति नहीं बन सकता। समाज के एक बड़े हिस्से को विकास की मुख्यधारा से पीछे छोड़कर एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की कल्पना अधूरी है। कोई माने या न माने, लेकिन देश का युवा इस सच को स्वीकार कर रहा है। डिजिटल युग का यह युवा वैश्विक मंच पर भारत की पहचान को मजबूत देखना चाहता है। उसे घरेलू स्तर पर विवादों में उलझा हुआ देश स्वीकार्य नहीं है। इस पूरे सामाजिक सरोकारों के बीच, अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समुदाय को भी आत्मनिरीक्षण और एक नई दिशा में कदम बढ़ाने की महती आवश्यकता है। मुस्लिम समाज अब भावुक मुद्दों, छद्म बहसों और बेमतलब के मजहबी प्रतीकों के इर्द-गिर्द सिमटी राजनीति के जाल से बाहर निकले। ऐतिहासिक गवाहियां और अदालती नजीरें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि न्याय और हक की लड़ाई संवैधानिक, शांतिपूर्ण और तार्किक तरीके से लड़ी जाती है, तभी पूरा समाज साथ खड़ा होता है इसलिए अब मुस्लिम समाज का संपूर्ण ध्यान और ऊर्जा पारंपरिक ढांचों से निकलकर शिक्षा के आधुनिकीकरण, रोजगार के नए अवसरों के सृजन और राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित होना चाहिए। मुस्लिम युवाओं का लक्ष्य प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्रों में अपनी मेधा का परचम लहराने पर होना चाहिए, ताकि वे देश की प्रगति के सहयोगी नियंता बन सकें।
लोकतंत्र का हथियार
प्रशासनिक तंत्र को भी इस संवेदनशीलता को आत्मसात करना होगा कि कानून का राज कानून की निष्पक्षता और न्यायसंगत व्यवहार से ही स्थापित होता है। सीमा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा या नगरीय नियोजन के नाम पर की जानेवाली कार्रवाइयां अगर पारदर्शी और भेदभाव रहित नहीं दिखेंगी तो इससे नागरिकों का व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाता है। लोकतंत्र में जनसंवाद ही सबसे बड़ा हथियार है। समस्याओं का स्थायी और तार्किक समाधान बुलडोजर संस्कृति या एकतरफा पैâसलों से मिलना मुश्किल है। उसे पाने के लिए संवाद, न्यायप्रियता और विधिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना जरूरी है। मरुधरा की माटी से उठी इंसानियत की यह महक पूरे देश के लिए एक मार्गदर्शक का काम कर सकती है, बशर्ते इस साझी विरासत को सहेजने का संकल्प हर स्तर पर अडिग रहे। खासकर मुस्लिम समाज अगर खुद पहल करे तो यह संकल्प सिद्ध होना कोई मुश्किल काम नहीं है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
