मुख्यपृष्ठस्तंभबढ़ता समुद्र, डूबता भविष्य और तैयारी की चुनौती

बढ़ता समुद्र, डूबता भविष्य और तैयारी की चुनौती

उमन गुप्ता

-मुंबई के तटीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन का असर

पर्यावरणविदों का कहना है कि मैंग्रोव वन मुंबई की प्राकृतिक सुरक्षा दीवार हैं। ये समुद्री लहरों की तीव्रता कम करते हैं, तटीय कटाव रोकते हैं और बाढ़ के प्रभाव को घटाते हैं। इसके बावजूद अतीत में शहरी विस्तार, अवैध निर्माण और अन्य विकास गतिविधियों के कारण कई स्थानों पर मैंग्रोव की अंधाधुंध कटाई हुई है, जो घातक है।’
मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, लेकिन यही शहर आज जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े खतरों में से एक का सामना कर रहा है। समुद्र के किनारे बसा यह महानगर हर साल मानसून के दौरान जलभराव, तटीय कटाव और हाई टाइड से जूझता है। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान बढ़ने की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले दशकों में समुद्र का बढ़ता जलस्तर मुंबई के कई तटीय इलाकों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
मुंबई का लगभग १५० किलोमीटर लंबा समुद्री तट केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी है। कोली मछुआरा समुदाय, तटीय बस्तियां, बंदरगाह, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और महत्वपूर्ण सड़कें समुद्र से सीधे जुड़ी हुई हैं। समुद्र का स्तर बढ़ने और तेज तूफानी लहरों की घटनाएं बढ़ने पर इन सभी पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारी बारिश और हाई टाइड के एक साथ आने से कई बार दक्षिण मुंबई, दादर, वर्ली, बांद्रा, जुहू और अंधेरी जैसे क्षेत्रों में व्यापक जलभराव देखने को मिला। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल अधिक बारिश नहीं है, बल्कि समुद्र के ऊंचे जलस्तर के कारण वर्षा का पानी तेजी से बाहर नहीं निकल पाता। इससे शहर की जल निकासी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
प्रभावित होगा तटीय आबादी का जीवन
दूसरी ओर, मुंबई में तटीय सड़क, मेट्रो, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शहर की परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विकसित की जा रही हैं। विशेषज्ञों का मत है कि ऐसी परियोजनाओं के साथ दीर्घकालिक जलवायु जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।

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