सना खान
शहर के एक पुराने बाजार में घड़ियां ठीक करने वाले एक बुजुर्ग की छोटी-सी दुकान थी। लोग कहते थे कि उनके हाथों में जादू है। वर्षों से बंद पड़ी घड़ियां भी उनकी मेज पर आकर फिर चलने लगती थीं। एक दिन लगभग पंद्रह साल का एक लड़का दुकान पर आया। उसके हाथ में एक पुरानी कलाई घड़ी थी।
उसने धीरे से कहा, ‘दादाजी, क्या यह ठीक हो जाएगी?’ बुजुर्ग ने घड़ी को ध्यान से देखा और मुस्कुराकर बोले, ‘घड़ी पुरानी है, लेकिन अभी भी चल सकती है।’ कुछ देर बाद घड़ी ठीक हो गई। लड़के ने जेब से मुड़े-तुड़े नोट निकाले। पैसे पूरे नहीं थे। वह झिझकते हुए बोला, ‘मेरे पास इतने ही हैं।’ बुजुर्ग ने नोट वापस उसकी हथेली पर रख दिए और कहा, ‘इन्हें अपने पास रखो। इस घड़ी को संभालकर रखना, बस यही मेरी मजदूरी है।’ लड़के की आंखें भर आईं। उसने घड़ी को सीने से लगा लिया और चुपचाप चला गया।
समय बीतता गया। एक बरसाती शाम दुकान का शटर बंद होने ही वाला था कि एक युवक अंदर आया। उसके हाथ में वही पुरानी घड़ी थी। उसने बिना कुछ कहे घड़ी बुजुर्ग की मेज पर रख दी। बुजुर्ग ने घड़ी को हाथ में लिया। कुछ पल उसे देखते रहे। फिर उनकी नजर युवक के चेहरे पर गई। वे मुस्कुरा दिए, जैसे वर्षों पुरानी कोई याद लौट आई हो। युवक की आंखें नम थीं। वह धीमी आवाज में बोला, ‘दादाजी, यह घड़ी आज भी चल रही है… क्योंकि उस दिन आपने सिर्फ इसका समय नहीं, मेरा विश्वास भी लौटा दिया था।’
कुछ क्षण दोनों के बीच खामोशी रही। फिर युवक बोला, ‘उस दिन मेरे पास पैसे नहीं थे। मुझे डर था कि अगर यह घड़ी ठीक न हुई, तो पिता की आखिरी निशानी हमेशा के लिए खो दूंगा। आपने पैसे नहीं लिए, लेकिन मुझे यह एहसास जरूर दिया कि दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है।’ बुजुर्ग की आंखें भर आईं। उन्होंने घड़ी युवक की हथेली पर रखते हुए कहा, ‘बेटा, घड़ियां सिर्फ समय नहीं बतातीं। वे उन लोगों की याद भी संभालकर रखती हैं, जिन्हें हम कभी खोना नहीं चाहते।’ दुकान के बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन भीतर दोनों की आंखों में वर्षों का अपनापन चमक रहा था। उस दिन वहां मौजूद हर व्यक्ति ने महसूस किया कि कुछ लोग हमारी जिंदगी में सिर्फ एक बार आते हैं, लेकिन उनका एक छोटा-सा अच्छा व्यवहार पूरी उम्र हमारे साथ चलता रहता है। कुछ लोग टूटी हुई चीजें नहीं, टूटे हुए भरोसे जोड़ जाते हैं। और वही लोग हमेशा याद रह जाते हैं।
