मुंबई हमेशा से सपनों का शहर रहा है। तेज रफ्तार जिंदगी, आधुनिक इंप्रâास्ट्रक्चर और लगातार बदलता शहरी स्वरूप इसकी पहचान हैं। लेकिन विकास की इस दौड़ में यह सवाल भी सामने खड़ा है कि क्या आधुनिकता की कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है?
हाल ही में मुंबई में हुई भारी बारिश, तेज हवाओं और ऊंचे समुद्री ज्वार ने शहर की व्यवस्थाओं की परीक्षा ली। कई जगहों पर पेड़ गिरने की घटनाएं सामने आर्इं, मकानों को नुकसान पहुंचा और कई लोगों की जान चली गई। इन घटनाओं के बाद एक बार फिर पेड़ों की सुरक्षा और शहर में तेजी से हो रहे कंक्रीटीकरण को लेकर बहस तेज हो गई है। शासन-प्रशासन ने कंक्रीट की सड़कों का बचाव करते हुए कहा कि मुंबई जैसे भारी वर्षा वाले शहर के लिए मजबूत और टिकाऊ सड़कों की जरूरत है। उनका तर्क है कि कंक्रीटीकरण से सड़कों की मजबूती बढ़ी है और गड्ढों की समस्या कम हुई है। सरकार का लक्ष्य आने वाले समय में मुंबई की अधिकांश सड़कों को कंक्रीट का बनाना है। लेकिन दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञों और आम नागरिकों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि कई स्थानों पर पेड़ों के तनों और जड़ों के आसपास पूरी तरह कंक्रीट बिछा दिया गया है। इससे मिट्टी तक पानी का पहुंचना कम हो जाता है और जड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिल पाती। धीरे-धीरे पेड़ों की पकड़ कमजोर होने लगती है, जिससे तेज बारिश या आंधी के दौरान उनके गिरने का खतरा बढ़ जाता है। मुंबई जैसे महानगर में पेड़ सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे शहर के प्राकृतिक सुरक्षा कवच भी हैं। वे वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने, तापमान नियंत्रित रखने और प्रदूषण कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि विकास के नाम पर पेड़ों की जड़ों को ही कमजोर कर दिया जाएगा, तो इसका असर आनेवाले वर्षों में और अधिक गंभीर हो सकता है।
विकास की दौड़ में कहीं दब न जाए प्रकृति की आवाज
इस बार बारिश के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ों के गिरने की घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या शहर की विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। पुराने और कमजोर पेड़ों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि स्वस्थ पेड़ों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। सरकार ने विशेषज्ञों से पेड़ों का आकलन कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके संरक्षण या हटाने की प्रक्रिया अपनाने की बात कही है। यह कदम आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही सड़कों और फुटपाथों के निर्माण में ऐसी तकनीक अपनानी होगी, जिससे पेड़ों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिलता रहे।
मुंबई को मजबूत सड़कें भी चाहिए और मजबूत पर्यावरण भी। विकास और प्रकृति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बनाया जा सकता। असली चुनौती यही है कि आधुनिक इंप्रâास्ट्रक्चर तैयार करते समय प्रकृति की आवाज भी सुनी जाए। कंक्रीट के जंगल में बदलती मुंबई को अब ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है, जहां ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों के साथ-साथ पेड़ों की जड़ें भी सुरक्षित रह सकें। क्योंकि सुरक्षित और टिकाऊ मुंबई वही होगी, जहां तरक्की की रफ्तार के साथ पर्यावरण का संतुलन भी कायम रहे।
