सना खान
एक छोटे से शहर में एक बुजुर्ग माली था। वर्षों से वह एक पुराने पार्क की देखभाल करता था। हर सुबह सबसे पहले वही पहुंचता और सबसे बाद में लौटता। पार्क में आने वाले लोग अक्सर उसे एक खाली बेंच के पास कुछ देर खड़े देखते। वह रोज उस बेंच की धूल साफ करता, उसके पास लगे पौधों में पानी देता और फिर अपने काम में लग जाता। किसी ने कभी उसे यह काम छोड़ते नहीं देखा।
एक दिन एक युवक ने पूछ लिया, ‘बाबा, क्या कोई रोज यहां आने वाला है?’ माली मुस्कुराया और बोला, ‘नहीं।’ युवक हैरान हुआ। ‘फिर आप इस बेंच का इतना खयाल क्यों रखते हैं?’ माली ने उस दिन कोई जवाब नहीं दिया। कुछ दिन बाद वही युवक फिर पार्क आया। इस बार उसने देखा कि एक बुजुर्ग महिला उस बेंच पर चुपचाप बैठी थी। उसकी आंखें बंद थीं और चेहरे पर अजीब-सी शांति थी। वह कुछ देर बैठी रही, बेंच पर हाथ फेरा और बिना कुछ कहे चली गई। महिला के जाने के बाद माली ने धीरे से कहा, ‘कई साल पहले उनके पति हर शाम इसी बेंच पर बैठकर उनका इंतजार करते थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन यह जगह उनकी यादों का हिस्सा है। मैं चाहता हूं कि जब भी वह यहां आएं, उन्हें लगे कि समय बदला है, यादें नहीं।’ युवक कुछ देर तक उस बेंच को देखता रहा। पहली बार उसे एहसास हुआ कि हर इंतजार किसी के लौट आने की उम्मीद नहीं होता। कुछ इंतजार सिर्फ यादों को जिंदा रखने के लिए भी होते हैं।
घर लौटते समय उसने अपनी मां को फोन किया। कई दिनों से वह काम की व्यस्तता में उनसे बात नहीं कर पाया था। फोन उठते ही मां ने मुस्कुराकर कहा, ‘आज तुम्हारी आवाज सुनकर बहुत अच्छा लगा।’
युवक की आंखें नम हो गर्इं। उसे समझ आ गया कि रिश्तों को हमेशा बड़े उपहारों की जरूरत नहीं होती। कई बार सिर्फ थोड़े-से समय, एक फोन या एक सच्चे हालचाल से भी दिल भर जाता है। हर इंतजार किसी के लौटने का नहीं होता। कुछ इंतजार उन रिश्तों और यादों का सम्मान होते हैं, जिन्होंने कभी हमारी जिंदगी को अर्थ दिया था। जो लोग चले जाते हैं, वे अक्सर हमारी यादों में हमारे साथ चलते रहते हैं।
