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संपादकीय : श्रीमान चमको, मराठवाड़ा में भूकंप आया है!

महाराष्ट्र की जनता आखिर कितने झटके झेले, यही समझ नहीं आ रहा है। जिसे हम प्रकृति का प्रकोप कहते हैं, उसके पीछे भी अब इंसानों का ही क्रूर हाथ दिखाई देने लगा है। एक तरफ बारिश का कहर और तबाही जारी है तो दूसरी तरफ मराठवाड़ा के तीन जिले भूकंप के झटकों से दहल गए हैं। हिंगोली, परभणी और नांदेड़ जिलों में डर का साया फैल गया है। गुरुवार की सुबह नांदेड़ समेत तीन जिले भूकंप से दहल गए और फिर नांदेड़ के विष्णुपुरी इलाके में राष्ट्रीय राजमार्ग पर भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़ा पुल गिर गया। इसे एक संयोग ही कहा जाएगा। मराठवाड़ा की जनता लातूर-किल्लारी के ३० सितंबर १९९३ के उस भयानक भूकंप की खौफनाक यादों से आज तक बाहर नहीं निकल पाई है। वह आजाद भारत के इतिहास के सबसे भीषण भूकंपों में से एक था। किल्लारी की एक पूरी पीढ़ी उस झटके में तबाह हो गई थी। इसीलिए जब भी जमीन हिलने लगती है, मराठवाड़ा के लोग बेचैन हो जाते हैं। पिछले कुछ समय से लातूर, नांदेड़, हिंगोली और परभणी जिलों में लगातार भूकंप के झटके लग रहे हैं; लेकिन सरकार अब भी कुंभकर्णी नींद में सोई हुई है। सरकार का ‘डिजास्टर मैनेजमेंट’ (आपदा प्रबंधन) सुन्न पड़ा है। ऐसा लगता है कि जब तक पूरी तरह विनाश नहीं हो जाता, तब तक फडणवीस सरकार इन झटकों की सुध नहीं लेगी। परभणी, हिंगोली और धाराशिव के शिवसेना सांसद ५०-५० करोड़ रुपए में बिक गए, इसका जनता को जरा भी झटका नहीं लगा। क्योंकि ‘गद्दारी’ अब झटका लगने जैसा विषय रही ही नहीं; लेकिन भूगर्भ (जमीन के अंदर) से उबलता हुआ लावा जब जमीन पर दरारें डालता है तो उस झटके से घर-बार और हंसते-खेलते संसार तबाह हो जाते हैं। इंसानी जानों पर बुलडोजर चल जाता है। हंसते-खेलते परिवार के परिवार नींद में ही खत्म हो जाते हैं। इस दुख का कोई अंत नहीं होता। गुरुवार, ९ जुलाई की सुबह मराठवाड़ा में आए भूकंप के चार झटके भले ही आज मामूली लग रहे हों, लेकिन इन झटकों ने आनेवाले कल के बड़े संकट का इशारा दे दिया है। अब विडंबना देखिए, मुंबई में चार दिन भारी बारिश क्या हुई, आपदा प्रबंधन विभाग के मंत्री
कैमरों की चकाचौंध में
उस ‘इमरजेंसी वॉर रूम’ में पहुंच गए। साथ में मुख्यमंत्री को भी ले गए। खूब ‘चमकोगीरी’ की गई, लेकिन मराठवाड़ा का भूकंप और उसके बाद का आपदा प्रबंधन इन ‘चमकों’ की गिनती में कहीं है ही नहीं। मराठवाड़ा की उपेक्षा हमेशा इसी तरह की जाती है। ९ जुलाई के इन झटकों ने न सिर्फ मराठवाड़ा, बल्कि उससे सटे विदर्भ के जिलों को भी हिला कर रख दिया। यवतमाल, वर्धा, बुलढाणा जिले के मेहकर, लोनार, वाशिम और अमरावती के कुछ हिस्सों तक भूकंप के ये झटके महसूस किए गए। सौभाग्य से, पहले झटके का केंद्र जमीन के अंदर १० किलोमीटर गहरा था इसलिए कोई जनहानि नहीं हुई। अगर यह केंद्र और ऊपर (जमीन के करीब) होता तो क्या मंजर होता, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्योंकि वक्त रात के पौने दो बजे का था और लोग गहरी नींद में सो रहे थे। ऐसे में अगर भूकंप की तीव्रता ज्यादा होती या उसका केंद्र जमीन की सतह के पास होता तो बचने का मौका मिलना भी मुश्किल हो जाता। पहले झटके से लोग हड़बड़ाकर जाग उठे और उसके तुरंत बाद सवा दो बजे दूसरा, फिर दो मिनट बाद तीसरा और सुबह ३.२३ बजे चौथा झटका आया। हिंगोली जिले में भूकंप के झटकों का जैसे एक सिलसिला ही चल पड़ा। लातूर के ६.७ रिक्टर स्केल के विनाशकारी भूकंप के बाद से लातूर, हिंगोली और नांदेड़, इन तीनों जिलों में लगातार भूकंप के झटके लग रहे हैं। २०२० से पिछले छह सालों में हिंगोली, औंढा नागनाथ, वसमत और कलमनुरी, इन चार तहसीलों में कुल ३७ झटके लग चुके हैं। इनमें से सबसे बड़ा झटका ४.७ तीव्रता का इसी साल ११ अप्रैल को आया था। उसके करीब तीन महीने बाद, मात्र दो घंटे के भीतर आए इन चार झटकों ने एक बार फिर दहशत फैला दी है। इससे पहले नांदेड़ शहर में २००६ से २००८ के बीच भूकंप के झटकों और रहस्यमयी आवाजों का एक डरावना सिलसिला चला था। पांच सौ से ज्यादा छोटे-बड़े झटकों और कान फाड़ देनेवाली रहस्यमयी आवाजों के कारण नांदेड़ शहर दो साल तक पूरी तरह
डर के साये में जीने को
मजबूर था। उसके बाद २१ जून २०१९ को आए भूकंप के झटके से नांदेड़ और उसके आस-पास के ३८१ गांव दहल गए थे। हिंगोली, नांदेड़ और परभणी के अलावा लातूर में भी अब भी बीच-बीच में भूकंप के झटके आते रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब भूकंप का केंद्र किल्लारी के बजाय लातूर और निलंगा तहसील की तरफ खिसक गया है। पिछले कुछ सालों में लातूर जिले में १२१ झटके आ चुके हैं। हिंगोली के इस ताजा भूकंप से न केवल मराठवाड़ा, बल्कि पड़ोसी राज्य कर्नाटक का बीदर जिला और तेलंगाना के आदिलाबाद तथा निजामाबाद तक की जमीन हिल गई। इसका सीधा मतलब यह है कि जमीन के अंदर न सिर्फ गहराई में, बल्कि मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और कर्नाटक तक दूर-दूर तक बहुत बड़ी हलचल चल रही है। हिंगोली से करीब दो सौ से तीन सौ किलोमीटर के दायरे को हिला देने वाली शक्तिशाली हलचल जमीन के नीचे सक्रिय है। पश्चिमी महाराष्ट्र का कोयना क्षेत्र और ठाणे, शाहपुर, पालघर का ३०० किलोमीटर का इलाका भी समय-समय पर भूकंप से कांपता रहता है। कभी भूकंप-सुरक्षित माने जानेवाला महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा अब भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र में बदल चुका है। भविष्य में और जमीन के पेट में क्या छिपा है, यह कोई नहीं जानता। लेकिन मराठवाड़ा में लगातार आ रहे भूकंपों का यह सिलसिला ऐसा है कि सरकार और प्रशासन को हड़बड़ाकर जाग जाना चाहिए। किल्लारी के उस महाविनाशकारी भूकंप के जख्मों और खौफ को मराठवाड़ा आज तक नहीं भूला है। मराठवाड़ा में भूकंप के ये बढ़ते झटके दरअसल आनेवाली किसी बड़ी आपदा की आहट हैं। मगर हमारे आज के हुक्मरान सिर्फ तोड़-फोड़ की राजनीति में मशगूल हैं। वे आपदा के समय भी वैâमरों की फ्लैशलाइट और चकाचौंध में डूबे हुए हैं। मुंबई की भारी बारिश के दौरान इमरजेंसी वॉर रूम में ‘चमकोगीरी’ करनेवाले मुख्यमंत्री और उनके आपदा प्रबंधन मंत्री को मराठवाड़ा के इन झटकों से अब तक कोई ‘झटका’ नहीं लगा है। वे आराम से सो रहे हैं। श्रीमान चमको, कुछ समझ में आ रहा है या नहीं? मराठवाड़ा में भूकंप आया है!

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