धनुर्धर
पिछले पूरे सप्ताह मुंबई मानसून की बारिश से पस्त रही। उससे पहले कई हफ्ते वह इसी मानसूनी बारिश के लिए त्रस्त रही। मुंबई की ही नहीं, अपने इस पूरे देश की यही कहानी है। पहले वह मानसून के लिए तरसता है और जब मानसून आकर बरसता है तो शुरू में देशवासियों का मन हरसता है, फिर सरसता है और आखिरकार सूरज देव के दर्शन के लिए तरसता है। इन शॉर्ट, यह मान लीजिए कि हम भारतवासियों के लिए तरसना डिफॉल्ट मोड है। किसी भी देश, काल, पात्र में यही मोड सबसे आम है। हम पहले किसी एक चीज के लिए तरसते हैं, फिर उस चीज को पाते हैं और फिर उस चीज से मुक्ति के लिए तरसने लगते हैं।
मौन पीएम
एक समय था, जब इस देश को ऐसा पीएम मिला हुआ था, जिसकी आवाज सुनने के लिए देशवासी तरसते रहते थे। चाहे जैसे भी हालात हों, क्या मजाल कि उनका मुंह खुल जाए और उससे कुछ शब्द फूटें, भरोसे के दो बोल सुनने को मिल जाएं। आलम यह था कि जब वे कुछ बोलते भी थे तो इस कंजूसी के साथ कि उनके शब्द उनकी विन्रमता की भेंट चढ़ जाते थे। शायद ही कभी देशवासियों को उनके शब्दों से कोई सहारा मिला हो। उनके काम से, सही समय पर लिए गए उनके पैâसलों से जरूर मिला, लेकिन मजाल है कि उनके मुंह से निकली आवाज ने कभी देशवासियों को आश्वस्त किया हो कि घबराने की कोई बात नहीं है, हमारा पीएम है जो सब संभाल लेगा।
वाचाल पीएम
खैर, यह स्थिति बदली। देश को नया पीएम मिला, ऐसा पीएम जो बोल सकता था, बोलता था। देशवासियों का मन पहले हरसा, और फिर सरसा। लगा कि एक पुरानी इच्छा पूरी हुई। पीएम की आवाज अब उनके लिए उपलब्ध हो गई है। लेकिन पीएम की आवाज भी मानसून की बारिश ही साबित हुई, एक बार शुरू हुई तो फिर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। बारह साल पहले जो ये बोलना शुरू हुए तो बोलते ही जा रहे हैं।
कोई शर्त नहीं
आमतौर पर पीएम के बोलने के साथ कई सारी शर्ते जुड़ी होती हैं। उन्हें मौके के अनुरूप बोलना होता है। अहम मुद्दों पर बोलना होता है। लेकिन हमारे इस पीएम को बोलने के साथ किसी तरह की शर्त लगाना मंजूर नहीं। सो, वे मौके, बेमौके, कुमौके बोलते रहते हैं। अगर जरूरी मुद्दे पर बोलने को कुछ न हो तो गैरजरूरी मुद्दों पर बोलते हैं। बोलने की अपनी जिद पूरी करने के लिए उन्होंने एक नया मंच, नया मौका ईजाद कर लिया है- मन की बात। अब उन पर यह बंदिश भी नहीं रही कि देशवासी क्या सुनना चाहते हैं। वे अपने मन की बात सबको सुनाते रहते हैं और सभी जानते हैं कि मन चंचल होता है, वह दूसरों की तो क्या खुद उनकी भी नहीं सुनता।
अद्भुत आत्मविश्वास
सो, वे बेलगाम होकर बोलते हैं। भले, ट्रांसलेटर उनके साथ बैठा हो, भले दो-दो प्रॉम्पटर लगे हों, पर कोई गारंटी नहीं कि वे बकवास नहीं करेंगे। वे विमानों को रडार की नजरों से बचाने के लिए बादलों का सहारा लेने की अभूतपूर्व तरकीब भी उसी आत्मविश्वास से साझा करते हैं, जितने भरोसे के साथ यह गुर बताते हैं कि थाली बजाने से कोरोना वायरस चला जाएगा। आप उनके सौ झूठ तो पकड़ सकते हैं, लेकिन उनका मुंह नहीं बंद कर सकते, न ही यह शर्त लगा सकते हैं कि वे सोच-समझ कर ही बोलें।
कंजूसी अखर गई
अब सोच-समझकर ही बोलना था तो पिछले पीएम ही क्या बुरे थे। सोचते थे, समझते थे, सही पैâसले करते थे। बस बोलने में ही तो कंजूसी करते थे। बस यही कमी देशवासियों को अखर गई। उन्हें लगा कि ऐसा भी क्या पीएम जो सही समय पर ढंग से बोल न सके तो ले लो भई। बोलने वाला पीएम मिल गया। मगर मामला ले-देकर मानसूनी बारिश जैसा ही हो गया। न हो तो आफत और हो तो आफत।
नाम बड़े, दर्शन छोटे
कहते हैं कि मानसून के नाम से ही उसकी खासियत झलकती है। मान-सून यानी वह जो मानता भी है और सुनता भी है। लेकिन नाम बड़े और दर्शन थोड़े वाली कहावत भी अपने ही देश में चलती है। नाम से बड़े-बड़े धोखा खा जाते हैं। असलियत यह है कि मानसून वह जो न तो किसी की मानता है और न सुनता है। लाख बुलाते रहें, आपके बुलाने से वह न आएगा और न बरसेगा। लेकिन जब उसका अपना मूड हुआ तो आप लाख मना करते रहें, वह बरसता रहेगा। बरस तो रहा है। बारिश तो हो ही रही है, बूंदों की भी और बयानों की भी।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
