शीतल अवस्थी
श्रीराम और रावण का युद्ध श्रीराम और रावण के युद्ध के ही समान था- उसकी कहीं भी दूसरी कोई उपमा नहीं थी। रावण वानरों पर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावण को चोट पहुँचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी ने रावण के ऊपर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। काटे हुए मस्तकों के स्थान पर दूसरे नए मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचंद्रजी ने ब्रह्मास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष; स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया। उस समय (मरने से बचे हुए सब) राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियां विलाप करने लगीं। तब श्रीरामचंद्रजी की आज्ञा से विभीषण ने उन सबको सांत्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया। तदनंतर श्रीरामचंद्रजी ने हनुमानजी के द्वारा सीताजी को बुलवाया। यद्यपि वे स्वरूप से ही नित्य शुद्ध थीं, तो भी उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपनी विशुद्धता का परिचय दिया। तत्पश्चात रघुनाथ जी ने उन्हें स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्रादि देवताओं ने उनका स्तवन किया। फिर ब्रह्मा जी तथा स्वर्गवासी महाराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा- ‘श्रीराम! तुम राक्षसों का संहार करने वाले साक्षात श्रीविष्णु हो।’ फिर श्रीराम के अनुरोध से इन्द्र ने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरों को जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचंद्र जी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गये। श्रीरामचंद्र जी ने लंका का राज्य विभीषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया।
