के.पी. मलिक
-क्या युद्ध हारकर भी रणनीतिक लिहाज से जीत रहा है ईरान?
-क्या ट्रंप की सबसे बड़ी कमजोरी बनी चीन की बड़ी ताकत?
दुनिया में आजकल युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं जीते जाते। कई बार युद्ध का असली परिणाम रणभूमि पर नहीं, बल्कि बाजारों, समुद्री मार्गों, जनमत, कूटनीति और अर्थव्यवस्था में तय होता है। यही कारण है कि ईरान–इजरायल–अमेरिका टकराव को केवल हवाई हमलों, ड्रोन और मिसाइलों की संख्या से समझना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि इस पूरे संघर्ष से राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक लाभ किसे मिला, किसकी स्थिति कमजोर हुई और किसकी मजबूत। अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए। ईरान ने जवाबी कार्रवाई का दावा किया। सैन्य दृष्टि से दोनों पक्ष अपनी-अपनी सफलता का दावा कर रहे हैं। लेकिन यदि व्यापक तस्वीर देखी जाए तो यह संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि धैर्य, जनमत और आर्थिक दबाव का भी युद्ध है।
अकेले पड़े ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को निर्णायक और कठोर नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन अमेरिका के भीतर उनके समर्थन, विदेश नीति और सैन्य पैâसलों पर लगातार बहस होती रही है। यह कहना कि ‘६७ फीसदी अमेरिकियों ने ट्रंप का साथ छोड़ दिया’ तभी उचित होगा जब इसे किसी विशिष्ट और विश्वसनीय सर्वेक्षण के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए। फिर भी यह स्पष्ट है कि लंबे विदेशी संघर्षों को लेकर अमेरिकी समाज में थकान और विभाजन मौजूद है। ईरान संभवत: इसी मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक कमजोरी को समझने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी सैन्य क्षमता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती घरेलू जनमत और लंबा युद्ध झेलने की सीमित राजनीतिक इच्छा है।
दूसरी ओर, ईरान ने केवल सैन्य जवाब नहीं दिया, बल्कि प्रतीकों और भावनाओं का भी इस्तेमाल किया। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और शिया धार्मिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द जो सार्वजनिक संदेश गढ़े गए, उनका उद्देश्य केवल ईरान के भीतर समर्थन जुटाना नहीं था, बल्कि व्यापक शिया समुदाय में ऐतिहासिक स्मृतियों जिनमें विशेषकर करबला और इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ाव पैदा करना भी था। यह धार्मिक और राजनीतिक संचार का एक पुराना तरीका है, जिसके माध्यम से संघर्ष को केवल वर्तमान की लड़ाई नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि, यह कहना कि किसी विशेष अंतिम यात्रा ने पूरे शिया समुदाय को एक ही दिशा में प्रभावित किया, एक व्यापक निष्कर्ष होगा, जिसके लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
चीन को फायदा!
दरअसल, इस पूरे संकट का सबसे बड़ा लाभार्थी यदि कोई दिखाई देता है तो वह चीन हो सकता है। चीन ने प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से दूरी बनाए रखी, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक संबंधों और कूटनीतिक संतुलन के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास जारी रखा। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है तो चीन स्वयं को एक वैकल्पिक आर्थिक और कूटनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। इसके अलावा, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा बाजार में होनेवाले बदलावों से भी उसे अवसर मिल सकते हैं। जाहिर तौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है। करीब ३४ किलोमीटर चौड़ी यह समुद्री पट्टी विश्व ऊर्जा व्यापार की जीवनरेखा मानी जाती है।
यदि यहां तनाव बढ़ता है तो उसका असर केवल तेल की कीमतों पर नहीं, बल्कि वैश्विक महंगाई, शिपिंग लागत और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि हॉर्मुज अब केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक सौदेबाजी का केंद्र बन चुका है।
सबसे बड़ा सबक
अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों विशेषकर खाड़ी देशों के संबंधों में भी समय के साथ बदलाव आया है। सऊदी अरब सहित कई क्षेत्रीय शक्तियां अब पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की कोशिश कर रही हैं। वे अमेरिका, चीन और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर चल रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके संबंध टूट गए हैं, बल्कि यह कि वे पहले की तुलना में अधिक बहुध्रुवीय कूटनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पश्चिम एशिया में बसे लाखों भारतीय, समुद्री व्यापार और रणनीतिक साझेदारियां- सभी इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ी हैं इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलित कूटनीति बनाए रखने की है, एक ओर अमेरिका और इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर ईरान और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा तथा संपर्क सहयोग।
बहरहाल, इस युद्ध का सबसे बड़ा सबक यही है कि २१वीं सदी में युद्ध का अर्थ केवल क्षेत्र जीतना नहीं रह गया है। अब युद्ध यह तय करता है कि वैश्विक जनमत कौन प्रभावित करेगा, ऊर्जा आपूर्ति पर किसका प्रभाव बढ़ेगा, आर्थिक अवसर किसे मिलेंगे और नई विश्व व्यवस्था में कौन निर्णायक भूमिका निभाएगा। संभव है कि सैन्य दृष्टि से कोई पक्ष स्वयं को विजेता घोषित करे। लेकिन यदि वैश्विक शक्ति संतुलन की दृष्टि से देखा जाए तो यह संघर्ष एक बड़े परिवर्तन की ओर संकेत करता है कि जहां अमेरिका अब निर्विवाद रूप से अकेला निर्णायक शक्ति केंद्र नहीं रह गया, चीन अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है, क्षेत्रीय शक्तियां अधिक स्वतंत्र भूमिका निभा रही हैं और मध्य-पूर्व फिर से वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बन गया है। युद्ध समाप्त हो सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा बदला गया शक्ति संतुलन दशकों तक दुनिया की दिशा तय करता है। शायद यही इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा और सबसे स्थायी संदेश है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
