मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत :  राहुल गांधी, अब फैसले का वक्त है

रुख-ए-सियासत :  राहुल गांधी, अब फैसले का वक्त है

तौसीफ कुरैशी

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र संगठन के भीतर अनुशासन और मर्यादा का भी दूसरा नाम है। जब पार्टी के भीतर हर नेता खुद को ही अंतिम सत्य मानने लगे, तब विचार पीछे छूट जाता है और अहंकार सबसे बड़ा संगठन बन जाता है। कांग्रेस आज इसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।
राजस्थान की कलह अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थी कि हरियाणा में नया अध्याय खुल गया। पंजाब पहले से ही गुटबाजी के दलदल में फंसा है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि किस नेता का पलड़ा भारी है, बल्कि यह है कि कांग्रेस का संगठन आखिर किस दिशा में जा रहा है? पार्टी ने पूरे विश्वास के साथ २०२५ को संगठन का वर्ष घोषित किया था। देशभर में प्रशिक्षण शिविर लगे, संगठन सृजन अभियान चले, कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा देने की बातें हुर्इं। लेकिन यदि हर राज्य में वही पुराने चेहरे, वही पुराने झगड़े और वही आरोप-प्रत्यारोप दिखाई दें, तो फिर उन अभियानों का अर्थ क्या रह जाता है? संगठन केवल बैठकों से नहीं बनता, संगठन विश्वास से बनता है। और विश्वास तब टूटता है जब कार्यकर्ता देखता है कि उसके नेता जनता की लड़ाई से ज्यादा एक-दूसरे से लड़ने में व्यस्त हैं। हरियाणा में नए प्रभारी संजय दत्त के कार्यभार संभालते ही जिस तरह नेताओं ने एक-दूसरे पर तंज कसने शुरू कर दिए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ लोगों की प्राथमिकता भाजपा से मुकाबला नहीं बल्कि अपने ही साथियों से हिसाब बराबर करना है। ऐसे माहौल में कोई भी प्रभारी कितना काम कर लेगा? जब घर के दरवाजे भीतर से बंद हों तो बाहर खड़ा व्यक्ति क्या कर सकता है? सबसे अधिक पीड़ा उस कार्यकर्ता की है, जो बिना किसी पद, बिना किसी स्वार्थ के कांग्रेस का झंडा उठाए हुए है। उसे न दिल्ली की गुटबाजी से मतलब है, न प्रदेश के शक्ति प्रदर्शन से। उसे केवल इतना चाहिए कि पार्टी जनता के बीच मजबूती से खड़ी हो, लेकिन उसके सपनों पर सबसे पहले चोट पार्टी के अपने ही क्षत्रप करते हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि कुछ नेताओं के समर्थक अब कार्यकर्ता कम और सोशल मीडिया के ट्रोल अधिक बन गए हैं।
वे विरोधियों से कम, अपनी ही पार्टी के लोगों को अधिक अपमानित करते हैं। वे समझते हैं कि इससे उनके नेता मजबूत होंगे, जबकि सच यह है कि इससे केवल कांग्रेस कमजोर होती है। गाली कभी संगठन नहीं बनाती, संवाद बनाता है।
संगठन में लोकतंत्र आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र का अर्थ अराजकता नहीं होता। निर्णय के बाद अनुशासन ही संगठन की असली पहचान होता है। यदि जननायक राहुल गांधी सचमुच कांग्रेस को नई दिशा देना चाहते हैं, तो अब उन्हें केवल संवाद नहीं बल्कि सख्त संगठनात्मक पैâसले भी लेने होंगे।
`विश्वगुरु’ बनने से पहले अपने घर का हाल देखिए
सभ्यताएं केवल ऊंची इमारतों, विशाल मंदिरों या भव्य मस्जिदों से महान नहीं बनतीं। उनकी महानता इस बात से तय होती है कि वे अपने से अलग आस्था रखने वाले इंसान के साथ वैâसा व्यवहार करती हैं। धर्मस्थल पत्थरों से बनते हैं, लेकिन राष्ट्र का चरित्र इंसानों के दिलों में बसता है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है। वहीं जावा द्वीप पर लगभग एक हजार वर्ष पुराना प्रम्बानन मंदिर आज भी पूरी गरिमा के साथ खड़ा है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित यह मंदिर केवल हिंदू संस्कृति की धरोहर नहीं बल्कि उस राष्ट्रीय सोच का प्रतीक है जो अपनी ऐतिहासिक विरासत को धर्म की कसौटी पर नहीं तौलती। यही कारण है कि यह यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है।
जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया की यात्रा के दौरान प्रम्बानन मंदिर पहुंचे और हिंदू रीति-रिवाज से पूजा की, तब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति भी उनके साथ मौजूद रहे। यह दृश्य केवल कूटनीति का नहीं था, बल्कि सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान का संदेश भी था। किसी ने इसे अपनी आस्था पर हमला नहीं माना, किसी ने समाज में नफरत पैâलाने की कोशिश नहीं की। यहीं से भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। कभी यही भारत अपनी विविधता पर गर्व करता था। सिख प्रधानमंत्री, मुस्लिम राष्ट्रपति, ईसाई, पारसी, सिख, बौद्ध और जैन समुदायों की समान भागीदारी हमारे लोकतंत्र की पहचान थी। `सर्वधर्म समभाव’ केवल संविधान की पंक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार था। आज तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। हाल के वर्षों में धार्मिक स्थलों, सांप्रदायिक तनाव, भीड़ हिंसा, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर लगातार बहस हुई है। इन घटनाओं ने देश की सामाजिक एकता और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
दूसरी ओर सरकार का कहना है कि उसका लक्ष्य सभी नागरिकों का समान विकास और कानून का समान शासन है। यही कारण है कि इन विषयों पर निष्कर्ष निकालते समय तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा दोनों का ध्यान रखना आवश्यक है। असल सवाल मंदिर या मस्जिद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी उस आत्मा को बचा पा रहा है जिसने दुनिया को `वसुधैव कुटुम्बकम’ और `सर्वधर्म समभाव’ का संदेश दिया था? क्या हम अपनी विविधता को ताकत मानेंगे या उसे राजनीतिक हथियार बना देंगे? प्रम्बानन मंदिर केवल इंडोनेशिया की धरोहर नहीं, बल्कि भारत के लिए भी एक आईना है। वह हमें याद दिलाता है कि बहुसंख्यक होना महानता की गारंटी नहीं देता, महानता तब आती है जब बहुसंख्यक अपने से भिन्न आस्था वाले नागरिक के अधिकारों की भी उतनी ही रक्षा करे जितनी अपने धर्म की करता है। राष्ट्र की असली पहचान उसके सबसे बड़े मंदिर या सबसे ऊंची मस्जिद से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहां हर नागरिक बिना भय, बिना भेदभाव और पूरे सम्मान के साथ अपनी आस्था का पालन कर सके। यदि भारत इस आदर्श को फिर से जीवित कर सका, तभी वह वास्तव में विश्वगुरु कहलाने का नैतिक अधिकार अर्जित करेगा।

सत्यमेव जयते

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