सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार की आर्थिक सेहत को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (वैâग) की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्ष २०२४-२५ के अंत तक राज्य ने २८,३२५ करोड़ रुपए का ऑफ-बजट (बजट से बाहर) कर्ज लिया, लेकिन इसका पूरा विवरण सरकारी बजट दस्तावेजों में शामिल नहीं किया गया। इससे राज्य की वास्तविक वित्तीय स्थिति और कुल कर्ज का सही चित्र जनता से छिपाए जाने पर सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र पर पहले से ही ८ लाख ५१ हजार १७ करोड़ रुपए का सार्वजनिक कर्ज और अन्य देनदारियां हैं। यदि ऑफ-बजट कर्ज को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो राज्य की वास्तविक देनदारी ८ लाख ७९ हजार ३४२ करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है। वैâग ने स्पष्ट किया है कि इस तरह की कर्ज व्यवस्था वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के विपरीत है। सबसे अधिक ऑफ-बजट कर्ज महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास महामंडल (एमएसआरडीसी) के माध्यम से जुटाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२४-२५ में एमएसआरडीसी ने लगभग १८,४४० करोड़ रुपए, वर्ष २०२३-२४ में ७,७०० करोड़ रुपए और वर्ष २०२२-२३ में २,५०० करोड़ रुपए का कर्ज लिया। वैâग का कहना है कि वित्तीय नियमों के अनुसार, ऐसे कर्ज और उस पर देय ब्याज का पूरा विवरण बजट में शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
सवालों के घेरे में सरकार की निधि प्रबंधन प्रणाली
रिपोर्ट में सरकार की निधि प्रबंधन प्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। राज्य के कुल राजस्व का ६२.५५ प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और अन्य अनिवार्य मदों पर खर्च हो रहा है। वहीं दूसरी ओर सरकारी बैंक खातों में बड़ी मात्रा में बिना खर्च किया गया धन पड़ा रहने पर भी वैâग ने आपत्ति जताई है।
