पिता को समर्पित!

पिता क्या है!

पिता की बाहें अपार हैं,
पिता की बाहों में विस्तार है।
अंबर-सा फैला तेरा प्यार है,
पिता, तू परिवार का संसार है।
पिता, तू अवनि-सा उदार है,
जीवन तेरा दिया उपहार है।
अपना रखे न लेशमात्र ध्यान,
परिवार के सुख का आधार है।
पिता, तू मां के माथे की बिंदिया है,
उसकी मांग का सिंदूर है।
हमें जन्म देकर तूने,
मां को पूर्ण नारीत्व का उपहार दिया है।
पिता, तू सागर-सा गहरा है,
जिसमें भरा असीम प्यार है।
कभी-कभी क्रोध की कुछ लहरें उठती हैं,
पर उत्तरदायित्व निभाने की पतवार थामे रहता है।
पिता, तू मंदिर-सा पावन है,
अपनत्व की मूरत है।
गुस्से में भी पिता का,
वरदहस्त ही उठता है।
पिता, तू परिवार का कल्पवृक्ष है,
सभी सुविधाएं जुटाता है।
प्यार से सींचो पिता के सम्मान को,
भविष्य भी पिता ही संवारता है।
पिता, तू कामधेनु है,
बिन मांगे अमृत-सा पोषण देता है।
मौन, शांत चित्त होकर रहता,
आत्मीयता का झरना है।
पिता की गोद में बैठना कभी-कभी ही मिलता है,
उसकी उंगली पकड़कर चलना सबने सीखा है।
उसके कंधों पर चढ़ना भी बहुत भाता है।
संतान को कभी बोझ नहीं मानता,
बच्चों के लिए सदा चिंतातुर रहता है।
बुढ़ापे तक काम करने की ठानता है।
पिता, तुम्हारे लिए वर्ष में एक दिन नहीं,
मेरा संपूर्ण जीवन ही समर्पित है।
-बेला विरदी

अन्य समाचार

मुखौटे