मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाआदमी को आदमी से डर लगता है

आदमी को आदमी से डर लगता है

माना कि महबस भी घर लगता है,
आदमी को आदमी से डर लगता है।
रूखी-सूखी रोटी, यातना की खेती,
जीवन के पतझड़ में उड़ती हुई रेती।
ऐ खिले हुए फूल, चुभते हैं ज्यों शूल,
अनुकूल मौसम भी लगे प्रतिकूल।
शाम-सा सावन-सहर लगता है,
आदमी को आदमी से डर लगता है।
बार-बार की गिनती, नींद-चैन को छिनती,
मन करता रब से रिहाई की विनती।
चुभती घर की याद, बहे मन का अवसाद,
मच्छरों के डंक से पहाड़ लगे रात।
शीतल समीर भी कहर लगता है,
आदमी को आदमी से डर लगता है।
बोलें बोली कुबोली, हिया पर लगे गोली,
बिगड़ जाए जेल में जीवन की रंगोली।
बहे सिर के ऊपर पानी, सम्मान पानी-पानी,
पनिया उतार देखिके सिसके ज़िंदगानी।
बंदी का जीवन ज़हर लगता है,
आदमी को आदमी से डर लगता है।
वर्तमान पर लगे दाग, बुझे भविष्य का चिराग,
भूत-भविष्य की चक्की में वर्तमान का अनुराग।
कहाँ गया विश्वास? कौन है यहाँ खास?
अपनों का अपनापन दिखे न आसपास।
सलाखों में शोक का समंदर लगता है,
आदमी को आदमी से डर लगता है।

डॉ. सुनील ‘सावन’
कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

अन्य समाचार

मुखौटे