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संपादकीय :  ईस्ट इंडिया कंपनी को ‘तिलक’ पुरस्कार!

एक जमाने में भारत के पुरस्कारों की दुनियाभर में प्रतिष्ठा थी। मोदी का दौर आने के बाद से तमाम राष्ट्रीय पुरस्कारों में भी घोटाले शुरू हो गए हैं। हाल के ‘पद्म’ पुरस्कारों के बारे में तो बात ही न की जाए। देश की कुछ नामचीन संस्थाओं और परिवारों की तरफ से दिए जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कारों को भी सिफारिश और चमचागीरी की दीमक लग चुकी है। लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान समारोह १ अगस्त को पुणे में संपन्न हुआ। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को यह पुरस्कार गृह मंत्री अमित शाह के हाथों दिया गया। अमित शाह के हाथ छात्रों के खून से सने हुए हैं। दिल्ली के ‘जंतर-मंतर’ पर हजारों छात्र अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे थे, तब अमित शाह के आदेश से ही इन छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन से हमला करके हाहाकार मचाया गया। बच्चों को जख्मी किया गया। पुलिस ने लड़कियों के साथ बदसलूकी की। उस हरकत का अमित शाह को बिल्कुल भी अफसोस हुआ हो, ऐसा नहीं दिखता। विपक्षी उनका इस्तीफा मांग रहे हैं। हाल के दिनों में शाह संसद जाने से डर रहे हैं। रात के अंधेरे में वे पुणे पहुंचे। यह जनाब पुणे पहुंचते, उससे पहले ही पुलिस ने सैकड़ों लोगों को हिरासत में ले लिया। ऐसे डरपोक गृह मंत्री के हाथों ‘पुरस्कार समिति’ तिलक पुरस्कार प्रदान करवाए, यह बेहद चौंकानेवाला है। लोकमान्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सच्चे मर्द और पुरुषार्थ दिखानेवाले गरम दल के नेता थे। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा’, यह अंग्रेजों के मुंह पर डंके की चोट पर कहनेवाले वे शेर-ए-हिंद थे। वे जेल गए। ‘सरकार का दिमाग ठिकाने पर है क्या?’ यह सवाल जब उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार से पूछा, तब कंपनी सरकार के पसीने छूट गए थे। अब अमित शाह की भी एक ईस्ट इंडिया कंपनी है और उन्होंने देश को ग़ुलामी में धकेल दिया है। आजादी का नाम लेने वालों के खिलाफ ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों को लगाकर वे उन्हें गिरफ्तार करते हैं। अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने डेढ़ सौ साल
भारत को लूटा
था, उससे कहीं ज्यादा लूट मोदी-शाह की ईस्ट इंडिया कंपनी कर रही है। देश के तमाम गुंडों और भ्रष्टाचारियों को इस कंपनी में सरकार ने पनाह दी है। ऐसी कंपनी के डायरेक्टर अमित शाह के हाथों लोकमान्य तिलक पुरस्कार प्रदान करना एक राष्ट्रीय अपराध है। तिलक के मौजूदा वारिस आखिर कौन हैं? यह सवाल इससे पैदा हो गया है। विरासत विचारों की होती है, सरनेम की नहीं। मौजूदा जूनियर तिलक गद्दारों के मिंधे गुट में शामिल हो गए, इसी में इस पुरस्कार के पीछे की साजिश साफ हो गई। मिंधे गुट के मालिक अमित शाह हैं। इसलिए इस साल का तिलक पुरस्कार चमचागीरी और चाटुकारिता में बह गया। खैर, पुरस्कार किसे दिया जाए तो सबसे नाकाम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल साहब को! उनकी काबलियत के किस्से ही ज्यादा मशहूर हैं। बाल नरेंद्र ने बचपन में नदी में कूदकर मगरमच्छ से कुश्ती लड़ी थी, ऐसी कहानियों की तरह कई अफसाने डोभाल साहब के जीवन चरित से चिपक गए हैं। अंधभक्तों को वे सच लगते हैं। कुछ लोगों ने उन अफसानों पर फिल्में भी बना लीं। पुरस्कार देते वक्त अमित शाह कहते हैं, ‘भारत की विदेश नीति को ठोस, बेबाक, मजबूत और स्वाभिमानी बनाने में डोभाल का बड़ा योगदान है।’ शाह और डोभाल एक-दूसरे पर तारीफों के पुल बांध रहे थे, उसी वक्त कश्मीर में आतंकी हमला हुआ और उसमें दो लोग मारे गए। जनाब डोभाल ने इस मौके पर फरमाया कि आजादी का मतलब बदअमनी या मनमानी नहीं है। देश के सामने आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। युवाओं को राष्ट्र निर्माण के काम में शामिल होना चाहिए, लेकिन खुद डोभाल का बेटा ब्रिटिश नागरिक है, यह बात पुरस्कार समिति को मालूम होनी चाहिए। डोभाल की बात सच है, लेकिन आजादी का मतलब बेलगाम तानाशाही भी नहीं है। जिस तानाशाही के पहिए तले भारतीय जनता आज कुचली जा रही है। कुछ हजार अंधभक्त पूरी भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं करते। पुणे में तिलक की पगड़ी सर पर रखकर उनके नाम का
पुरस्कार लेते वक्त
डोभाल को भी ‘सरकार का दिमाग ठिकाने पर है क्या?’ यह सवाल अमित शाह के सामने पूछना चाहिए था। डोभाल ने ऐसा नहीं किया। उल्टे मोदी-शाह की बनाई तानाशाही ईस्ट इंडिया कंपनी के वे एक डायरेक्टर बन गए। उन्होंने विरोधियों पर जासूसी करने और पार्टियां तोड़ने में अपना योगदान दिया। डोभाल के ही दौर में पठानकोट, उरी, पुलवामा और पहलगाम जैसे हादसे हुए। डोभाल के ही जमाने में मसूद अजहर की रिहाई हुई। पुलवामा हमले में ४० जवान नाहक शहीद हो गए, लेकिन उस हमले में इस्तेमाल हुआ ३०० किलो आरडीएक्स कहां से आया, ये जेम्स बॉन्ड साहब ढूंढ नहीं पाए। अमेरिका के दबाव में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ मोदी सरकार ने अधूरा छोड़ दिया। चीन ने गलवान घाटी में घुसकर २० भारतीय जवानों को मार डाला, फिर भी डोभाल का भारतीय सुरक्षा और विदेश नीति को मजबूत करने में बड़ा योगदान है, ऐसा अगर तिलक पुरस्कार समिति को लगता है तो यह एक दिमागी दिवालियापन है। मौजूदा तिलक मिंधे गुट में हैं। मिंधे साहब की सिफारिश पर यह पुरस्कार डोभाल को दिया गया और पुरस्कार देने के लिए मिंधे वालों ने अपने आकाओं को बुलाया। उसके एवज में मौजूदा तिलक को क्या इनाम मिलता है, यही देखना बाकी है। इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह, वर्गीस कुरियन, प्रणब मुखर्जी, शीला दीक्षित, एस. एम. जोशी, गोदावरी परुलेकर, श्रीपाद अमृत डांगे, अब्दुल गफ्फार खान, अच्युतराव पटवर्धन, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, प्रकाश-विकास आमटे, सैम पित्रोदा जैसी महान शख्सियतों को इससे पहले लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इससे तिलक पुरस्कार की चमक और बढ़ी थी। लेकिन पुणे की ताबां और प्रतिष्ठा को कम करने का बीड़ा कुछ लोगों ने उठा रखा है। उस करतूत में महान लोकमान्य तिलक के वंशज शामिल हों, यह अच्छी बात नहीं है। दिल्ली के अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन में मिंधे को महादजी शिंदे पुरस्कार देना और डोभाल साहब को ‘तिलक’ पुरस्कार देना महाराष्ट्रीय समाज का नैतिक पतन है।

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