लगातार दूसरे दिन भी कपिल सिब्बल ने जोरदार दलीलें दीं
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
उन्होंने कहा कि आयोग का यह फैसला अन्यायपूर्ण और उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। २१ जून २०२२ को मूल राजनीतिक दल में किसी प्रकार के विभाजन के स्पष्ट संकेत भी मौजूद नहीं थे, फिर भी हमारे पक्ष और चुनाव चिह्न को ले लिया गया। उसके बाद गैरकानूनी रूप से सरकार बनी।
शिवसेना से अलग हुए विधायकों की अयोग्यता पर फैसला होने से पहले ही ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न छीनने का चुनाव आयोग द्वारा लिया गया फैसला पूरी तरह गलत था। कल सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघते हुए घोड़े के आगे गाड़ी जोड़ने जैसा उल्टा काम किया।
उन्होंने कहा कि पार्टी संगठन के बहुमत को नजरअंदाज कर केवल विधायक दल के संख्या बल के आधार पर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर पैâसला दिया गया। लगातार दूसरे दिन पक्ष और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न तथा गद्दार विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामले में जोरदार बहस करते हुए सिब्बल ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। राजनीतिक हलकों के साथ पूरे महाराष्ट्र की नजरें जिस शिवसेना मामले की अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं, उसकी सुनवाई कल मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष हुई। कपिल सिब्बल ने लगातार दूसरे दिन अपनी दलीलें जारी रखते हुए चुनाव आयोग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई कार्रवाई पर कड़ा विरोध जताया।
इलेक्शन कमीशन ने लिया उल्टा फैसला
उन्होंने कहा कि सबसे पहले गद्दार विधायकों की अयोग्यता पर फैसला होना चाहिए था और उसके बाद ही पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न पर निर्णय लिया जाना चाहिए था। लेकिन चुनाव आयोग ने उल्टे पहले पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर पैâसला सुनाया। आयोग का यह कदम घोड़े के आगे गाड़ी जोड़ने जैसा था। इसके बाद शिंदे गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मिल गया तथा उसी चुनाव चिह्न पर उसने चुनाव लड़कर जीत हासिल की।
पार्टी विधान की वैधता पर फैसला करने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं!
पार्टी विधान की वैधता पर फैसला करने का
अधिकार चुनाव आयोग को नहीं!
सत्ता में रहने वाले लोग चुंबक की तरह होते हैं
कपिल सिब्बल ने कहा कि वर्ष २०१८ के शिवसेना के पार्टी विधान के अनुसार, पार्टी संगठन के अधिकांश सदस्यों का समर्थन उद्धव ठाकरे के साथ था। इसी कारण २०१८ के पार्टी विधान में निर्धारित संगठनात्मक ढांचे की अनदेखी की गई और १९९९ के पार्टी विधान को आधार बनाना सुविधाजनक समझा गया। वास्तव में विधायकों और सांसदों के बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं था। पार्टी विधान की वैधता पर आयोग कोई पैâसला नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि अधिक से अधिक आयोग यह कह सकता था कि आपके पास मान्य पार्टी विधान नहीं है और उस आधार पर पार्टी की मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। इससे आगे का अधिकार आयोग के पास नहीं था।
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग जिस २०१८ के पार्टी विधान का उल्लेख करता है, उसी को वह खारिज भी कर देता है। हम दोनों में से कोई भी कभी इस विधान को लेकर चुनाव आयोग के पास नहीं गया था, फिर आयोग को यह दस्तावेज कहां से मिला? विधानसभा अध्यक्ष ने अब तक अयोग्यता पर पैâसला नहीं दिया और अन्य सभी तथ्य पहले ही अदालत के पैâसलों से स्पष्ट हो चुके हैं। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने संगठनात्मक पक्ष की पूरी तरह अनदेखी की। अवैध सरकार का गठन कभी नहीं होना चाहिए था, इससे उन्हें सब कुछ मिल गया। सत्ता में बैठे लोग चुंबकीय शक्ति की तरह होते हैं। वे बिखरे हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। इसी वजह से ३१ विधायक बढ़कर ३९ हो गए। यह संख्या ५६ भी हो सकती है। यदि अयोग्यता का पैâसला लंबित रखकर ऐसा होने दिया गया तो यह बेहद गलत परंपरा होगी।
पार्टी संगठन में हमारा स्पष्ट बहुमत,
२० लाख सदस्यों का समर्थन
सिब्बल ने कहा कि हमने साबित किया है कि पार्टी संगठन में हमारा स्पष्ट और भारी बहुमत है। हमारे पक्ष में पूरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी, अधिकांश उपनेता, अधिकांश सचिव, जिलाप्रमुख, विभागप्रमुख और लगभग १९.४ लाख प्राथमिक सदस्यों का समर्थन था। जबकि शिंदे गुट के साथ केवल ४.४८ लाख प्राथमिक सदस्य थे। यही कारण है कि चुनाव आयोग ने २०१८ के पार्टी संविधान की अनदेखी की।
जिस संविधान के आधार पर शिंदे विधायक और मंत्री बने, उसी को उन्होंने नकार दिया
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि संविधान की दसवीं अनुसूची में विधायक दल और राजनीतिक दल को अलग-अलग माना गया है। शिवसेना में जो विभाजन हुआ, वह केवल विधायक दल में हुआ था, राजनीतिक दल में नहीं। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने उसे राजनीतिक दल का विभाजन मानकर गलत निर्णय दिया। उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे के पक्षप्रमुख रहते जिस पार्टी संविधान के आधार पर एकनाथ शिंदे विधायक और मंत्री बने, बाद में उसी संविधान को उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
पहले दल-बदल संवैधानिक पाप था, आज
सम्मान का प्रतीक बन गया -न्यायमूर्ति बागची
न्यायमूर्ति बागची ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले दल-बदल को संवैधानिक पाप माना जाता था, लेकिन आज की परिस्थितियों में वह पाप नहीं बल्कि मानो सम्मान का प्रतीक बन गया है। उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस विचार का भी उल्लेख किया कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह संविधान भी प्रभावी नहीं रह पाएगा।
अगले सप्ताह फिर होगी सुनवाई
शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कल लगभग एक घंटे तक अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों, केरल कांग्रेस मामले, सुभाष देसाई प्रकरण और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए शिवसेना का पक्ष मजबूती से रखा। न्यायालय ने उनकी दलीलों पर गंभीरता से विचार किया और शेष बहस के लिए अगले सप्ताह मंगलवार या बुधवार को सुनवाई निर्धारित करने की बात कही।
पार्टी विधान पर ही नहीं दिया ध्यान
सिब्बल ने अदालत को बताया कि वास्तव में चुनाव आयोग को पार्टी के विधान की वैधता की जांच करने का अधिकार ही नहीं था। मूल शिवसेना और शिंदे गुट, दोनों ने ही २०१८ के पार्टी विधान के आधार पर अपना-अपना दावा किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने पार्टी विधान पर ध्यान ही नहीं दिया। आयोग के समक्ष लाखों शपथपत्र प्रस्तुत किए गए थे, जिनसे स्पष्ट था कि पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं का भारी बहुमत उद्धव ठाकरे के साथ है। इसके बावजूद आयोग ने उनकी अनदेखी की। केवल विधायक दल में हुई टूट को मूल राजनीतिक दल में विभाजन मान लेने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं था।
