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आज बड़े व्यापारी, कल आम जनता!

यूपीआई पर एमडीआर की राह साफ; लोकसभा से बिल पास, सरकार का दावा, जनता पर शुल्क नहीं, लेकिन मुफ्त डिजिटल भुगतान के भविष्य पर उठे सवाल

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जिस यूपीआई को सरकार ने वर्षों तक ‘मुफ्त डिजिटल क्रांति’ बताकर घर-घर पहुंचाया, अब उसी पर शुल्क लगाने का कानूनी दरवाजा खोल दिया गया है। लोकसभा ने गुरुवार, ६ अगस्त को भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, २००७ में संशोधन वाले प्रावधान को मंजूरी दे दी। इससे केंद्र सरकार भविष्य में बैंकों और भुगतान सेवा कंपनियों को चुनिंदा यूपीआई तथा अन्य डिजिटल लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वसूलने की अनुमति दे सकेगी।
सरकार और वित्तीय क्षेत्र के सूत्रों का कहना है कि फिलहाल आम नागरिकों के व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी २ पी भुगतान पर कोई शुल्क लगाने का प्रस्ताव नहीं है। किसी रिश्तेदार, मित्र या परिचित को यूपीआई से भेजा गया पैसा पहले की तरह मुफ्त रहने की उम्मीद है। एमडीआर मुख्य रूप से व्यापारी को किए गए भुगतान पर लगता है और उसका भुगतान सामान्यत: व्यापारी बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को करता है।
सरकार का भरोसा, लेकिन ग्राहक पर पड़ सकता है बोझ पेज २
२,००० से अधिक भुगतान पर लग सकता है शुल्क
विचाराधीन विकल्पों में बड़े व्यापारियों को किए जानेवाले २,००० से अधिक के यूपीआई भुगतान पर लगभग ०.२५ से ०.५ प्रतिशत एमडीआर लगाने का प्रस्ताव शामिल है। एक अन्य मॉडल व्यापारी के सालाना कारोबार के आधार पर शुल्क तय करने का है। हालांकि, सरकार ने अभी अंतिम दर, सीमा या लागू होने की तारीख घोषित नहीं की है।

-आश्वासन और वास्तविक बाजार व्यवहार के बीच सबसे बड़ा अंतर

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
तकनीकी रूप से एमडीआर व्यापारी से वसूला जाता है, ग्राहक से नहीं। लेकिन बाजार का सामान्य नियम है कि व्यापारी अपनी बढ़ी हुई लागत वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में जोड़ देता है। ऐसे में शुल्क भले ही ग्राहक के यूपीआई खाते से सीधे न कटे, उसका अप्रत्यक्ष बोझ महंगी वस्तु, अतिरिक्त सुविधा शुल्क या नकद भुगतान की मांग के रूप में आम जनता पर पड़ सकता है। यही सरकार के आश्वासन और वास्तविक बाजार व्यवहार के बीच सबसे बड़ा अंतर है। आज कहा जा रहा है कि शुल्क केवल बड़े व्यापारियों पर लगेगा। कल बड़े कारोबारी इसे ग्राहकों पर डालेंगे और परसों शुल्क की सीमा छोटे व्यापारियों तथा आम भुगतानों तक बढ़ाने की मांग उठ सकती है।
पहले आदत लगाई, अब कमाई की तैयारी?
वर्ष २०२० में सरकार ने यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड पर शून्य एमडीआर व्यवस्था लागू कर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया था। इससे दुकानदारों और ग्राहकों ने नकदी छोड़कर ैंR कोड तथा मोबाइल भुगतान को तेजी से अपनाया। अब जब देश का बड़ा हिस्सा यूपीआई पर निर्भर हो चुका है, सरकार ने शुल्क लगाने का कानूनी विकल्प तैयार कर दिया है।
बैंक और फिनटेक कंपनियां लंबे समय से तर्क दे रही हैं कि भुगतान नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को मुफ्त में चलाना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है। प्रस्तावित एमडीआर से डिजिटल भुगतान उद्योग को सालाना हजारों करोड़ रुपए की आय हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि इस कमाई की कीमत आखिर कौन चुकाएगा, बड़ा व्यापारी, छोटा दुकानदार या अंतिम उपभोक्ता?
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लोकसभा से पारित संशोधन ने तत्काल हर यूपीआई भुगतान पर शुल्क लागू नहीं किया है। इसने सरकार को भविष्य में अधिसूचना जारी कर शुल्क की अनुमति देने का अधिकार दिया है। अंतिम नियम, दर, लेन-देन सीमा और प्रभावित व्यापारियों की श्रेणी बाद में तय की जाएगी।
सरकार कह रही है, आम जनता निश्चिंत रहे, यूपीआई मुफ्त रहेगा। लेकिन नागरिकों की चिंता भी बेबुनियाद नहीं है। टोल, बैंकिंग सेवा शुल्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म फीस का इतिहास बताता है कि शुल्क अक्सर सीमित दायरे से शुरू होता है और धीरे-धीरे उसका विस्तार होता जाता है।

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