शीतल अवस्थी
सावन के माह में वैसे तो सभी दिन पवित्र होते हैं लेकिन जहां तक सावन के कृष्ण पक्ष की बात है तो इसमें सोमवार, गणेश चतुर्थी, मंगला गौरी व्रत, मौना पंचमी, माह का पहला शनिवार, कामिका एकादशी और मास शिवरात्रि का बेहद महत्व है।
हिंदू धर्म शास्त्र में शिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण व्रत पर्व है। चूंकि यह दिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है, इसलिए सावन की इस शिवरात्रि के दिन महिलाओं को हर हाल में व्रत-संकल्प करना चाहिए। स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर शिवालय में जाकर या भगवान शिव की प्रतिमा के सामने महामृत्युंजय मंत्र का १०८ बार जप करना श्रेष्ठ है। प्रत्येक मंत्र जप के साथ एक बिल्वपत्र चढ़ाते रहें। भगवान शिव को बिल्व पत्र, धतूरा व भांग अर्पित करें। क्योंकि भगवान शिव को द्वादश मासों में सावन मास अत्यधिक प्रिय होता है।
शिव पुराण के अनुसार सावन में भगवान शिव, प्रत्येक शिवलिंग जिसकी नित्य पूजा-अर्चना होती हो, में जागृत अवस्था में सदा विराजमान रहते हैं। मास शिवरात्रि के दिन भोले का रुद्री के मंत्रों द्वारा अभिषेक करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। भगवान शिव ही सभी भूतों के आदिकर्ता संहर्ता और परिपालक हैं। इसी कारण ये ब्रहमा, विष्णु, इंद्रादि समस्त देवों के अधिपति हैं। शिवरात्रि के दिन शिव पूजन में बेलपत्र, सफेद फूल के साथ धतूरा चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। बेलपत्र की तरह धतूरा भी शिव को प्रिय बताया गया है। हालांकि धतूरा जहरीला फल होता है, लेकिन सनातन धर्म को मानने वाला हर व्यक्ति यह जानता है कि शिव ने समुद्र मंथन से निकले गरल यानी जहर को पीकर ही जगत की रक्षा की। शिव ने जहर अपने गले में ही संचित कर लिया, उसे निगला नहीं, इससे उनका गला (कंठ) नीला हो गया। तब उन्हें नीलकंठ का नाम मिला। शिव ने दुनिया को बचा लिया। शिवरात्रि इसलिए भी मनाई जाती है। दरअसल, शिव ने हलाहल (विष) पीकर जगत को परोपकार, उदारता और सहनशीलता का संदेश दिया।
भगवान शिव वैद्यनाथ के रूप में भी पूजनीय हैं। इसलिए उनका इस स्वरूप की भक्ति निरोग बना देती है। मन ही मन ॐ नम: शिवाय का जप करते हुए जिस कार्य के लिए आप जा रहे हैं, उसे पूर्ण करने की प्रार्थना करें। अंत में चंदन से शिवलिंग का पूजन कर सफेद रंग के प्रसाद के साथ पांच किशमिश, पांच बताशे व लौंग का जोड़ा चढ़ाएं। फिर हाथ जोड़कर घर आ जाए। आपको सफलता अवश्य मिलेगी। शिवरात्र के दिन यह अवश्य करें। निरोगी जीवन सबसे बड़ी संपदा है। शिव पूजा में धतूरे जैसा जहरीला फल चढ़ाने के पीछे भी भाव यही है कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में कटु व्यवहार और वाणी से बचें, स्वार्थ की भावना न रखकर दूसरों के हित का भाव रखें। तभी अपने साथ दूसरों का जीवन सुखी हो सकता है। शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाकर मन और विचारों की कड़वाहट निकालने और मिठास को अपनाने का संकल्प लें। यदि मंत्रों द्वारा शिव की पूजा में असमर्थ हों तो पंचाक्षर या रुद्राष्टकम् मंत्र से पूजा आराधना करें तो भी विशिष्ट फल की प्राप्ति होती है। नम: शिवाय पंचाक्षर मंत्र कहलाता है। इस मंत्र से भगवान रुद्र की जप-पूजा करने से भक्तों को विशेष फल की प्राप्ति होती है। परंतु आधुनिक समाज के अनुसार इस वेद मंत्र को साधारण समझा जाता है। जबकि यह मंत्र परम सिद्धियों का दाता है एवं यह भगवान रुद्र को अत्यंत प्रिय है। इस मंत्र का उल्लेख यजुर्वेदीय रुद्राध्याय में मिलता है।
नमे:शंभवे च मयोभवेच नमे: शंकरायेच
मयस्करायच नमे: शिवाये च शिववेरा च।
