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संपादकीय: मोदी नाम का कोलंबस!

प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने राष्ट्र के खजाने की लूट ही शुरू कर दी है। अब तक के किसी भी प्रधानमंत्री की तुलना में उन पर होने वाला खर्च अत्यधिक है। मोदी के इस खर्च को वैसे तो व्यक्तिगत माना जाना चाहिए, लेकिन इसका हजारों करोड़ का बोझ देश के खजाने पर पड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा खर्च खुद की ब्रांडिंग, फिजूल के विदेश दौरों और राजनीतिक रोड शो पर हुआ है। यह सब बेहिसाब है और इसकी भरपाई कौन करेगा? राज्यसभा में विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इन छह महीनों में ही मोदी के विदेश दौरों पर लगभग ८५ करोड़ रुपये खर्च हुए। २०२१ से अब तक के विदेश दौरों का हिसाब लगाया जाए, तो लगभग ६०० करोड़ रुपये मोदी की विदेश उड़ानों पर खर्च हुए हैं। सिर्फ २०२५ में लगभग २०० करोड़ रुपये परदेश दौरों पर उड़ा दिए गए हैं। मलेशिया, इजरायल, यूएई, नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे, इटली, प्रâांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों की एक लंबी सूची है। सरकार कहती है कि मोदी के दौरों से देश को फायदा हुआ, समझौते हुए, निवेश आया; लेकिन वह हकीकत में जमीन पर कहीं दिखाई नहीं देता। इन सभी समझौतों से हमारे देश के किसान, बेरोजगार युवा और आम नागरिक को क्या लाभ हुआ, इसका विश्लेषण करने की मानसिक स्थिति में मोदी नहीं हैं। मोदी के विदेश दौरे घाटे का सौदा हैं। उनका संवाद और भाषा तो वैसे ही समस्याजनक है, जिससे शिष्टाचार की पूरी तरह ऐसी की तैसी होती रहती है। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को जबरदस्ती गले लगाते फिरना, इटली की प्रधानमंत्री मैडम के लिए चॉकलेट वगैरह लेकर जाना और उसके ‘रील्स’ बनाना, इसके लिए परदेश दौरों का आयोजन करके सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाना, यह एक तरह से राष्ट्रीय खजाने का खयानत है। मोदी खुद को अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प का स्वघोषित मित्र मानते हैं। मूल रूप से अमेरिका एक व्यापारी देश है; वहां मित्रता जैसा भावनात्मक रिश्ता नहीं होता। मित्रता के नाते अमेरिका सामने वाले को निचोड़कर अपना फायदा तो कर लेगा, लेकिन मित्र का फायदा हो ऐसा कुछ नहीं करेगा।
मोदी ट्रंप के मित्र हैं। ट्रंप से मिलने और उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए वे दुनिया भर के मंचों पर जाते हैं, लेकिन अमेरिका से भारतीय जनता को क्या फायदा हुआ? अभी अमेरिका ने भारत को एक बड़ा झटका दिया है। रशियन तेल खरीदने वाले भारत पर १०० प्रतिशत टैरिफ ट्रंप सरकार ने थोप दिया है। इससे भारतीय सामानों का अमेरिका में निर्यात महंगा हो जाएगा। कपड़ा, दवाइयां, गहने, रसायन, ऑटोमोबाइल के कलपुर्जे जैसे निर्यात को मार पड़ेगी। मोदी-ट्रंप मित्र हैं या मोदी विश्वगुरु हैं, इसलिए भारत को इस टैरिफ में कोई छूट नहीं मिली। तो फिर लगातार अमेरिका के चक्कर लगाकर मोदी ने क्या हासिल किया? मोदी सरकार जनता के पैसों का गबन कर रही है। केंद्र सरकार ने बेहिसाब खर्च किया; ऐसे ५४ हजार करोड़ रुपये का हिसाब मोदी सरकार नहीं दे सकी। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कैग की ताजा आर्थिक लेखा-परीक्षा ऑडिट रिपोर्ट ने मोदी सरकार के बजटीय प्रबंधन और आर्थिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसका मतलब है कि मोदी के हर मंत्रालय में बड़े पैमाने पर धांधली जारी है। मोदी की सरकार जनता के लिए नहीं, बल्कि गौतम अडानी जैसों के फायदे के लिए चलाई जा रही है। मोदी के विदेश दौरे इसी काम के लिए आयोजित किए जाते हैं। मोदी जिस देश में जाते हैं, वहां के बड़े समझौते और हितसंबंध अडानी के फायदे के लिए ही इस्तेमाल किए जाते हैं। मोदी और इजरायल के बीच विशेष रिश्ते हैं, जो भारतीय विदेश नीति के प्रतिकूल है। मोदी समय-समय पर इजरायल जाते हैं, उसके पीछे का रहस्य यह है कि इजरायल के हाइफा बंदरगाह में ७० प्रतिशत हिस्सेदारी अडानी पोर्ट्स के पास है। २०२३ में १२ अरब डॉलर का सौदा करके यह बंदरगाह अडानी ने कब्जे में लिया, जिसमें मोदी की मध्यस्थता महत्वपूर्ण रही। ‘यूएई’ का दौरा मोदी ने मई २०२६ में किया और तुरंत जुलाई २०२६ में अडानी एंटरप्राइजेज और अबू धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी घ्प्ण् के बीच ओडिशा के एल्युमिनियम प्रोजेक्ट के लिए लगभग ११.५ अरब डॉलर का समझौता हो गया।
ऑस्ट्रेलिया में भी यही
हुआ। अडानी ग्रुप का कारमाइकल कोयला खदान में निवेश है। दिसंबर २०२५ में नॉर्थ क्वींसलैंड एक्सपोर्ट टर्मिनल र्र्‍ैेंंऊ का अधिग्रहण पूरा हुआ और तुरंत जुलाई २०२६ में मोदी ने ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया। मोदी जिस देश की सैर करते हैं, वहां अडानी का निवेश शुरू हो जाता है। अमेरिका में अडानी पर आर्थिक धोखाधड़ी और घूसखोरी के मामले दर्ज हुए, लेकिन मोदी ने भारतीय किसानों और छोटे निर्यातकों के हितों की बलि देकर अमेरिका से अडानी को बचा लिया। जहां मोदी का दौरा, वहां अडानी का व्यापारिक समझौता, यह महज कोई इत्तेफाक नहीं है। देश के खजाने के करोड़ों रुपये खर्च करके प्रधानमंत्री एक उद्योगपति के फायदे के लिए विदेशी दौरों पर जाते हैं; इसमें राष्ट्रहित कहां आया? सच तो यह है कि ये फिजूल के विदेश दौरे श्रीमान मोदी को अडानी कंपनी के खर्चे पर करना ज्यादा उचित रहेगा। देश का प्रधानमंत्री विदेश जाता है, उस देश से संबंध मजबूत होते हैं और फिर उन राजनयिक संबंधों का सबसे ज्यादा फायदा एक विशिष्ट उद्योग समूह को ही होता है। यह सवाल गंभीर है और अब इस पर चर्चा को टाला नहीं जा सकता। सरकार विदेशी निवेश को लेकर झू’े आंकड़े देती है। देश में इतने लाख करोड़ का विदेशी निवेश आया, नए प्रोजेक्ट आए, समझौते हुए, वैश्विक व्यापार बढ़ा, इसके ढोल पीटे जाते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं दिखता। देश की महंगाई और बेरोजगारी पर मोदी के विदेश दौरों ने कोई मात नहीं दी है। वर्षों से अमेरिका में रह रहे भारतीयों को ‘घुसपै’िया’ बताकर ट्रंप ने हाथ-पैरों में हथकड़ियां और बेड़ियां डालकर वापस भारत भेज दिया, यह मोदी के लिए शर्मनाक था। फिर भी मोदी की ट्रम्प-भक्ति का राग जारी है और विदेश दौरों की उड़ानें थमी नहीं हैं। राष्ट्र के खजाने से खर्च होने वाला एक-एक रुपया जवाबदेही के साथ ही खर्च होना चाहिए। यह रुपया राष्ट्रहित के लिए ही खर्च होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों के खर्च ने सारी हदें पार कर दी हैं। ५४ हजार करोड़ रुपये का तो कोई हिसाब ही नहीं मिल रहा है। मोदी ने परदेश दौरों के लिए कोलंबस और वास्को-डि-गामा की तरह नए-नए देश ढूंढ निकाले, लेकिन भारतीय जनता को क्या मिला?

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