मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम: विद्रोह के लिए उकसाना अपराध

कोर्ट-रूम: विद्रोह के लिए उकसाना अपराध

एड. कनई बिस्वास

-विद्रोह के लिए उकसाना, वरिष्ठ अधिकारी पर हमले के लिए उकसाना तथा ऐसे हमले के घटित होने पर उकसाना

धारा १६०, १६१ और १६२
भाग:५४
भारतीय न्याय संहिता, २०२३ सशस्त्र बलों में अनुशासन, आदेशों के पालन और कमान व्यवस्था को सर्वोच्च महत्व देती है। सेना, नौसेना और वायुसेना की कार्यप्रणाली अनुशासन पर आधारित होती है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति सैनिक, नौसैनिक या वायु सैनिक को विद्रोह के लिए उकसाता है, वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए दुष्प्रेरित करता है या उसके उकसावे के कारण ऐसा हमला वास्तव में हो जाता है तो यह गंभीर अपराध माना जाता है। धारा १६०, १६१ और १६२ इन्हीं प्रावधानों को स्पष्ट करती हैं।
केस स्टडी – १: ‘विद्रोह के लिए दुष्प्रेरण’ (धारा १६०)
एक व्यक्ति ने सेना के कुछ जवानों को अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश न मानने और सामूहिक रूप से विद्रोह करने के लिए उकसाया। उसके प्रभाव में आकर जवानों ने वास्तव में विद्रोह कर दिया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाया था?
क्या उसके उकसावे के कारण वास्तव में विद्रोह हुआ?
क्या आरोपी की भूमिका साक्ष्यों से सिद्ध होती है?
फैसला- यदि यह साबित हो जाता है कि आरोपी के दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप विद्रोह हुआ तो उसके विरुद्ध धारा १६० के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा १६० तब लागू होती है, जब किसी व्यक्ति के उकसाने या दुष्प्रेरण के कारण वास्तव में सेना, नौसेना या वायुसेना में विद्रोह हो जाता है। कानून इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध अत्यंत गंभीर अपराध मानता है।
केस स्टडी – २: ‘वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए दुष्प्रेरण’ (धारा १६१)
एक व्यक्ति ने एक सैनिक को उसके कमांडिंग अधिकारी पर हमला करने के लिए उकसाया। हालांकि, सैनिक ने हमला नहीं किया और समय रहते अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने सैनिक, नौसैनिक या वायु सैनिक को उसके वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए उकसाया?
क्या वरिष्ठ अधिकारी उस समय अपने सरकारी कर्तव्य का पालन कर रहा था?
क्या दुष्प्रेरण के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं?
फैसला- यदि यह साबित हो जाता है कि आरोपी ने वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए दुष्प्रेरण किया था तो उसके विरुद्ध धारा १६१ के तहत कार्रवाई की जाएगी, भले ही हमला न हुआ हो। समझें: धारा १६१ का उद्देश्य सशस्त्र बलों में अनुशासन बनाए रखना है। केवल हमला ही नहीं, बल्कि हमला करने के लिए उकसाना भी कानून की नजर में अपराध है।
केस स्टडी- ३: ‘दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वरिष्ठ अधिकारी पर हमला’ (धारा १६२)
एक सैनिक को लगातार उसके वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए उकसाया गया। अंतत: उसने अपने अधिकारी पर हमला कर दिया, जिससे वह घायल हो गया। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि हमला दुष्प्रेरण का परिणाम था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने सैनिक को वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए दुष्प्रेरित किया था?
क्या उसके दुष्प्रेरण के कारण वास्तव में हमला हुआ?
क्या उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की भूमिका सिद्ध करते हैं?
फैसला- यदि यह साबित हो जाता है कि आरोपी के दुष्प्रेरण के कारण वरिष्ठ अधिकारी पर हमला हुआ तो उसके विरुद्ध धारा १६२ के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा १६२ उन मामलों पर लागू होती है, जहां दुष्प्रेरण केवल प्रयास तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिणामस्वरूप वास्तव में वरिष्ठ अधिकारी पर हमला हो जाता है। ऐसे मामलों में कानून अधिक कठोर दंड का प्रावधान करता है। भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि सशस्त्र बलों का अनुशासन और कमान व्यवस्था राष्ट्र की सुरक्षा की आधारशिला है। इसलिए विद्रोह के लिए उकसाना, वरिष्ठ अधिकारी पर हमला करने के लिए दुष्प्रेरित करना तथा ऐसे दुष्प्रेरण के कारण हमला हो जाना- ये सभी अत्यंत गंभीर अपराध हैं। कानून इन अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान करता है, ताकि सेना, नौसेना और वायुसेना की अनुशासन व्यवस्था अक्षुण्ण बनी रहे।
(अगले अंक में: धारा १६३, १६४ और १६५ – ‘सैनिक, नौसैनिक या वायु सैनिक को भगोड़ा बनने के लिए दुष्प्रेरित करना, भगोड़े सैनिक को शरण देना तथा व्यापारी पोत के कप्तान की लापरवाही से भगोड़े सैनिक का जहाज पर छिपा रहना’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)

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