चंद्रपुर-गडचिरोली इलाकों में नक्सलवाद खत्म करने की ‘डींगें’ मुख्यमंत्री फडणवीस हांकते रहते हैं, पर इससे आदिवासी समाज की तड़प-तड़पकर होनेवाली मौतें बंद नहीं हुई हैं। नक्सलियों की बंदूकें भले ही ठंडी पड़ गई हों, लेकिन सरकार की लापरवाही से आदिवासियों का ‘खून’ गडचिरोली में अब भी बह रहा है। मुंबई समेत महाराष्ट्र में कई जगहों पर अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के सरकारी समारोह चल रहे थे, उसी रात गडचिरोली में एक भयानक घटना घटी। धानोरा तहसील की जपतलाई स्थित अनुदानित आश्रमशाला में सांप के डसने से तीन छात्राओं की मौत हो गई। कुल छह छात्राओं को सांप ने काटा था। तीन की जान चली गई। दो की हालत चिंताजनक है। आज भी आदिवासी बच्चे कितनी भयानक स्थिति में जी रहे हैं, यह इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी उनके पीछे लगा मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का मालिकाना हक है, लेकिन इस मूल मालिक को बेदखल करके चंद्रपुर-गडचिरोली में भाजपा को चंदा देनेवाले बड़े उद्योगपति घुस आए हैं। अन्य जंगलों की वन भूमि भी उद्योगपतियों के हवाले करने का सिलसिला राज्य के हुक्मरानों ने चला रखा है। इन लोगों के दिल्ली से लेकर गली तक के चहेते उद्योगपति अडानी को तो रायगड और अमरावती में ८३ हजार ७०० वर्ग फुट वन भूमि राज्य सरकार ने मंजूर की है। गडचिरोली में ९३७ हेक्टेयर वन भूमि एक दूसरी बड़ी कंपनी को लौह अयस्क खदान के विस्तार के लिए दी गई है। इन परियोजनाओं के कारण जल, जंगल, जमीन के असली भूमिपुत्रों को विस्थापित होना पड़ रहा है। खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस गडचिरोली जिले के पालकमंत्री हैं। देवेंद्र फडणवीस गडचिरोली को देश का प्रमुख ‘स्टील हब’ और नक्सलमुक्त, पर्यावरण-अनुकूल समृद्ध जिला बनाना चाहते हैं। इस दुर्गम और पिछड़े इलाके में बड़ा औद्योगिक निवेश लाना चाहते हैं। रोजगार पैदा करके जिले का कायापलट करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का यह ‘विजन’ अच्छा है, लेकिन जिन पसंदीदा उद्योगपतियों को वे गडचिरोली में लाए और खदान उद्योग के लाइसेंस
दिए, उन्होंने आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन का पूरा सत्यानाश कर दिया। उनके उद्योगों से वहां प्रदूषण बढ़ा है। इस वजह से आदिवासियों के घरों में पके चावल पर लाल-पीली परत जम जाती है और वही खाना आदिवासियों को खाना पड़ता है। दूषित पानी पीना पड़ता है। इसके खिलाफ शिकायत करनेवालों को नक्सली, देशद्रोही बताकर जेल में डालने का इंतजाम फडणवीस के प्रशासन ने कर ही रखा है। इन उद्योगों ने वन्यजीवों को भी विस्थापित कर दिया है। सांप, तेंदुए जंगलों में रहते हैं। वही उनका प्राकृतिक आवास है। लेकिन खदान उद्योग द्वारा जंगलों और पहाड़ों का विनाश किए जाने के कारण तेंदुए और सांप आदिवासी बस्तियों व स्कूलों में घुस आए और हमला करके छोटी बच्चियों की जान ले ली। इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। इस इलाके के खदान उद्योग का रवैया शैतानीभरा है। उनके जो ट्रक अंधाधुंध गति से चलते हैं, उन ट्रकों के नीचे अब तक डेढ़ हजार से ज्यादा आदिवासी कुचलकर मर चुके हैं, लेकिन ऐसा हादसा होते ही पल भर में उस कुचले हुए शव को गायब करके खून से सने रास्ते पर पानी का छिड़काव कर उसे साफ कर दिया जाता है। गडचिरोली का विकास आदिवासियों के खून और निर्दोषों के सर्पदंश की तड़प पर खड़ा है। गडचिरोली में औद्योगिक क्रांति के नाम पर सरकार आदिवासियों का सामूहिक अंतिम संस्कार कर रही है। गडचिरोली की आश्रमशाला में सांप के काटने से मरे बच्चे आदिवासी समाज का भविष्य थे। यह सिर्फ सर्पदंश की कोई साधारण खबर नहीं है, बल्कि आदिवासी बच्चों के जीने के अधिकार पर हुआ सरकारी हमला है। गडचिरोली में धर्मरावबाबा आत्राम जैसे आदिवासी नेता सरकार में चाटुकारिता कर रहे हैं। वे आदिवासियों के बजाय वहां के उद्योगपतियों के कारिंदे बनकर काम करते हैं। नरहर जिरवाल जैसे आदिवासी प्रतिनिधि सरकार में व्यक्तिगत स्वार्थ और मौज-मस्ती में ही डूबे हुए हैं। आदिवासियों का सरकारी फंड चुराया जा रहा है। वे चोर सरकार में ही मौजूद हैं। आदिवासी आश्रमशालाएं उन बच्चों का दूसरा घर हैं। वहां स्वच्छता, चिकित्सा सुविधाएं और सुरक्षा जैसी बुनियादी चीजें होनी ही चाहिए, लेकिन आज तस्वीर क्या है? आश्रम शालाओं की दीवारें ढह चुकी हैं, जमीन धंस गई है। उसमें से सांप और बिच्छू निकल रहे हैं। वहां बच्चों को सोने के लिए बेड तक नहीं हैं। उन्हें नीचे जमीन पर सोना पड़ रहा है। गडचिरोली जैसी सर्पदंश की घटनाएं इसी वजह से हो रही हैं। ऊपर से आसपास कोई अस्पताल नहीं है। इन बच्चों को घटिया दर्जे का भोजन दिया जाता है। छात्र-छात्राओं का बहुत ही बुरे तरीके से शोषण होता है और उनकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं है। आदिवासी इलाकों में आज भी बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था अस्तित्व में ही नहीं है। आज भी बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को चादर की झोली बनाकर तहसील के अस्पताल तक इलाज के लिए ले जाना पड़ता है। उस सफर में ही कितनों का दम घुट जात्ाा है। बच्चों की मौत होने पर माता-पिता को अपने बच्चों के शव कंधों पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़ता है, क्योंकि वहां सरकारी एंबुलेंस सेवा उपलब्ध नहीं है। और मुख्यमंत्री फडणवीस गडचिरोली को ‘स्टील सिटी’ बनाने निकले हैं। वहां के आदिवासियों को बेदखल करके, उनके जंगल काटकर, नदियां प्रदूषित करके, पहाड़ तोड़कर और उससे अपने चहेते उद्योगपतियों की तिजोरियां भरकर मुख्यमंत्री फडणवीस और उनके लोग किसके लिए सरकार चला रहे हैं? मुट्ठी भर अमीर उद्योगपतियों के लिए। सांप के डसने पर इलाज मिल सके, ऐसी व्यवस्था जहां नहीं है, उस गडचिरोली से नक्सलवाद इन लोगों ने खत्म किया तो उद्योगपतियों की सुरक्षा के लिए, आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने के लिए नहीं। आदिवासी समाज में नक्सलवाद क्यों पनपता है? इसका जवाब आदिवासियों के शोषण और उन पर हो रहे अत्याचारों में छिपा है। हुक्मरान गडचिरोली के खदान मालिकों के गुलाम हैं और उन्होंने वहां के आदिवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। गडचिरोली जिला अब आदिवासियों का नहीं रहा, बल्कि बाहर से आए खदान उद्योगपतियों ने गडचिरोली पर कब्जा कर लिया है। वहां के गरीब आदिवासी खदान मालिकों की गाड़ियों के नीचे कुचलकर मर रहे हैं और उनके बच्चे सांप के काटने से तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे हैं। देवेंद्र फडणवीस, यह क्या चल रहा है? आदिवासियों को मुंबई आकर मंत्रियों के घरों में सांप और बिच्छू छोड़ देने चाहिए, ताकि उन्हें समझ आए कि मौत का डर क्या होता है। यह सरकार पूरी तरह नाकारा है।
