-२०१८ की पार्टी संविधान व्यवस्था अमान्य है तो उसी के आधार पर शिंदे का चुनाव कैसे वैध?
-शिवसेना के १९९९ के पार्टी विधान में ‘मुख्य नेता’ नाम का कोई पद ही नहीं है, फिर शिंदे को किस आधार पर यह पद?
-विधायकों की अलग बैठक बुलाने का अर्थ राजनीतिक दल में विभाजन होना नहीं है।
सामना संवाददाता / सामना संवाददाता
शिवसेना पक्ष और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न से जुड़े मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मंगलवार को भी सर्वोच्च न्यायालय में जोरदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग केवल एक न्यायाधिकरण है। उसे किसी राजनीतिक दल और उसके चुनाव चिह्न पर पैâसला करने का अधिकार नहीं है।
सिब्बल ने शिंदे गुट को पक्ष और चुनाव चिह्न सौंपने के केंद्रीय चुनाव आयोग के पैâसले पर सवाल उठाते हुए उसके अधिकार क्षेत्र की मर्यादा सामने रखी। उन्होंने पूछा कि यदि चुनाव आयोग ने २०१८ के पार्टी विधान को अमान्य माना था तो उसी विधान के आधार पर एकनाथ शिंदे के चुनाव को वैâसे वैध ठहराया गया?
सिब्बल ने यह भी सवाल उठाया कि शिवसेना के १९९९ के पार्टी संविधान में ‘मुख्य नेता’ नाम का कोई पद ही नहीं है। फिर एकनाथ शिंदे ने किस आधार पर खुद को यह पद प्रदान किया? उन्होंने कहा कि विधायकों की अलग बैठक होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि राजनीतिक दल में विभाजन हो गया है।
इन दलीलों को अदालत ने गंभीरता से सुना और उनका संज्ञान लिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष शिवसेना मामले की अंतिम सुनवाई चल रही है। मंगलवार दोपहर हुई सुनवाई के दौरान शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने लगातार करीब एक घंटे तक जोरदार दलीलें पेश कीं।
सुनवाई के शुरुआती दो दिनों में बागी विधायकों की अयोग्यता के मुद्दे पर तीखे सवाल उठाने के बाद मंगलवार को सिब्बल ने चुनाव आयोग की कथित गैरकानूनी कार्रवाई पर भी विस्तार से दलीलें रखीं। उन्होंने भारतीय संविधान के प्रावधानों और शिवसेना के पार्टी विधान व्यवस्था का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल खड़ा किया।
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग केवल एक न्यायाधिकरण है। किसी राजनीतिक दल का पार्टी विधान संवैधानिक है या असंवैधानिक, यह तय करने का अधिकार आयोग के पास नहीं है। इसलिए चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक दल के पार्टी विधान में लोकतांत्रिक व्यवस्था की जांच करने का भी अधिकार नहीं है। सिब्बल की इन दलीलों को तीन सदस्यीय पीठ ने गंभीरता से सुना और उनका संज्ञान लिया। पिछले करीब तीन वर्षों से लंबित शिवसेना के इस मामले में आखिरकार अंतिम सुनवाई शुरू हो चुकी है। लगातार दो सप्ताह तक शिवसेना की ओर से कपिल सिब्बल अपनी दलीलें रखेंगे। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियों के चलते अब इस मामले के अंतिम पैâसले को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई है।
शिंदे गुट को पक्ष और चुनाव चिह्न किस अधिकार के तहत दिया गया?
लाभ लेने के बाद शिंदे गुट की ‘अवसरवादी’ भूमिका
कपिल सिब्बल ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि पार्टी का विधान असंवैधानिक था, तो चुनाव आयोग अधिकतम पार्टी का पंजीकरण रद्द कर सकता है। जब आयोग का अधिकार क्षेत्र केवल इतना ही सीमित है तो उसने शिंदे गुट को पक्ष और चुनाव चिह्न किस अधिकार के तहत सौंपा?
कपिल सिब्बल ने कहा कि शिंदे गुट ने २०१८ के पार्टी संविधान का विरोध किया। लेकिन इसी संविधान के आधार पर वे विधायक और मंत्री बने। फिर क्या उस प्रक्रिया को भी लोकतंत्र-विरोधी माना जाना चाहिए? जिस पार्टी संविधान के आधार पर लाभ हासिल किए गए, उसी संविधान को बाद में लोकतंत्र-विरोधी बताना ‘अवसरवादी रवैया’ ही कहा जाएगा।
पार्टी वैâसे चलानी है, यह आयोग नहीं बता सकता!
सिब्बल ने कहा कि किसी राजनीतिक दल को वैâसे चलाया जाए, यह चुनाव आयोग तय नहीं कर सकता। पार्टी में पदाधिकारियों का चुनाव किस तरह हो, पार्टी की संगठनात्मक संरचना वैâसी हो, किन पदों के लिए चुनाव कराया जाए। अपनी संगठनात्मक व्यवस्था तय करने का अधिकार राजनीतिक दल को है।
चुनाव आयोग की भूमिका में विरोधाभास
कपिल सिब्बल ने केंद्रीय चुनाव आयोग की भूमिका में मौजूद कथित विरोधाभास को भी सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा। उन्होंने कहा कि यदि आयोग तीन पत्राचारों के आधार पर यह मानता है कि पार्टी में विभाजन हुआ था तो उसका आधार ही गलत है।
सिब्बल की दलीलों के प्रमुख बिंदु
– विधायक दल में विभाजन का अर्थ यह निष्कर्ष निकालना कि पूरी शिवसेना पार्टी में विभाजन हो गया, चुनाव आयोग का निर्णय गलत है।
– दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता पर पैâसला लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास है। जब पैâसला लंबित था, तब उसी मुद्दे को चुनाव आयोग के पैâसले से जोड़ना गलत है।
– विधायक दल की अलग बैठक आयोजित करना या विधायिक शाखा से संबंधित पत्राचार करना, राजनीतिक दल में विभाजन होने का प्रमाण नहीं है।
– २१ जून के पत्र का संबंध केवल विधायिक शाखा से था।
– चुनाव आयोग द्वारा अनुच्छेद १५ के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब राजनीतिक दल में वास्तविक विभाजन हुआ हो।
– शिवसेना का चुनाव चिह्न तय करते समय केवल विधायिक दल में मौजूद संख्याबल को आधार बनाना उचित नहीं है।
