मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: बच्चे आखिर कहां सुरक्षित हैं घर, स्कूल या इंटरनेट?

फलसफा: बच्चे आखिर कहां सुरक्षित हैं घर, स्कूल या इंटरनेट?

सना खान

शाम के करीब सात बजे थे। बारह साल का आरव स्कूल से लौटकर चुपचाप कमरे में चला गया। मां ने पूछा, ‘दिन वैâसा रहा?’ जवाब मिला-‘ठीक था।’ कुछ दिन पहले तक आरव स्कूल की छोटी-बड़ी बातें बताता था, लेकिन अब मोबाइल हाथ में लेकर चुप बैठा रहता था।
अगले दिन स्कूल में उसकी कक्षा अध्यापिका ने भी बदलाव देखा। आरव दोस्तों से दूर रहने लगा था और खेल के समय अकेला बैठता था। पूछने पर उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने बताया कि उसे धमकाकर चुप रहने के लिए कहा गया था। अध्यापिका ने सिर्फ इतना कहा-‘तुम्हारी गलती नहीं है।’
आरव की कहानी काल्पनिक है, लेकिन सवाल वास्तविक
मुंबई के माहिम में हाल ही में १३ वर्षीय लड़के के यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। पुलिस ने पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की। एनसीआरबी के २०२४ के आंकड़ों के अनुसार, देश में बच्चों के खिलाफ १,८७,७०२ मामले दर्ज हुए, जबकि २०२३ में यह संख्या १,७७,३३५ थी। महाराष्ट्र में २४,१७१ मामले दर्ज किए गए।
खतरा सिर्फ बाहर नहीं
बच्चों की दुनिया अब घर और स्कूल से आगे इंटरनेट तक पहुंच चुकी है। अनजान लोगों से बातचीत, निजी जानकारी या तस्वीरें मांगना, धमकी और ब्लैकमेल जैसे खतरे बच्चों को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए माता-पिता और स्कूलों को बच्चों से खुलकर बात करनी होगी। उनके व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श, निजी सीमाओं और मदद मांगने का तरीका समझाना जरूरी है। बच्चों की सुरक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि भरोसे, संवाद और जागरूकता से मजबूत होगी।

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