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ठाणे सिविल अस्पताल की लिफ्ट में कैद हुई जिंदगी!

-नवजात और मरीजों को लेकर बीच में अटकी लिफ्ट
-घंटों बाद रेस्क्यू, सरकारी अस्पतालों के मेंटेनेंस की खुली पोल

द्रुप्ति झा / मुंबई
ठाणे-पश्चिम स्थित सिविल अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे मरीजों को गुरुवार को उस समय जिंदगी और मौत के बीच जूझना पड़ा, जब अस्पताल की लिफ्ट अचानक बीच में ही अटक गई। लिफ्ट में एक नवजात बच्चे, उसकी मां समेत करीब सात मरीज और अन्य महिलाएं घंटों फंसी रहीं। बंद लिफ्ट के भीतर दमघोंटू माहौल बन गया और बाहर परिजनों की बेचैनी बढ़ती गई। अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। आखिरकार बचाव दल की मदद से फंसे लोगों को बाहर निकाला गया, लेकिन इस घटना ने सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस अस्पताल में मरीजों को जिंदगी दी जाती है,े वहीं अस्पताल का लिफ्ट लोगों की जान के लिए खतरा बना हुआ है। ठाणे सिविल अस्पताल सीधे महाराष्ट्र सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अधीन आता है। अस्पताल की इमारत और लिफ्ट जैसी यांत्रिक सुविधाओं के रखरखाव से जुड़े काम में सार्वजनिक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी की भूमिका है। ऐसे में अब सवाल केवल लिफ्ट खराब होने का नहीं, बल्कि मेंटेनेंस, सुरक्षा जांच और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था का है।
सवाल यह है कि हर हादसे के बाद जांच और आश्वासन के बावजूद सरकारी अस्पतालों की लिफ्टें आखिर कब सुरक्षित होंगी? ठाणे की घटना ने व्यवस्था की गंभीर खामियों पर सवाल खड़ा कर दिया है।
सरकारी अस्पतालों में लिफ्ट बनी मुसीबत
यह महाराष्ट्र में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा कोई पहला गंभीर मामला नहीं है। जनवरी २०२६ में बीड जिला अस्पताल की लिफ्ट कई दिनों तक बंद रहने की खबर सामने आई थी। गंभीर हालत में सीटी स्वैâन के लिए ले जाई जा रही बुजुर्ग महिला को अस्पताल की सीढ़ियों और अस्थायी स्ट्रेचर की मदद से ले जाना पड़ा, इससे भी ज्यादा गंभीर मामला छत्रपति संभाजीनगर के घाटी अस्पताल में सामने आया था। फरवरी २०२४ में गंभीर मरीज को दुर्घटना विभाग से आईसीयू ले जाते समय लिफ्ट करीब १०-१५ मिनट तक बंद रही और आईसीयू में दाखिल किए जाने से पहले ही मरीज की मौत हो गई।

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