तौसीफ कुरैशी
फिर सवाल बहुत सीधा है जब देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ी आफत आई थी, तब इस पैसे का इस्तेमाल कितना हुआ और क्यों नहीं हुआ?
कोरोना की दूसरी लहर याद है? अस्पतालों के बाहर कतारें थीं, ऑक्सीजन के लिए लोग भटक रहे थे, रेमडेसिविर के लिए मारामारी थी और श्मशान घाटों पर जगह कम पड़ रही थी। उसी दौर में देश से कहा गया था कि आपदा के समय मदद के लिए पीएम केयर्स फंड है। अब इसके ताजा खातों से पता चलता है कि वित्त वर्ष २०२४-२५ के अंत में इस फंड का बैलेंस करीब ८,४५२ करोड़ रुपए था और पूरे साल भुगतान लगभग ८७.८५ लाख रुपए रहा यानी उस साल के भुगतान की तुलना में फंड का आकार इतना बड़ा है कि सवाल उठना स्वाभाविक है कि पैसा रखा किस लिए गया है।
सरकार खुद कहती है कि पीएम केयर्स का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा सहित किसी भी आपात स्थिति में राहत, स्वास्थ्य ढांचे और जरूरी सहायता के लिए धन उपलब्ध कराना है। फिर सवाल बहुत सीधा है जब देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ी आफत आई थी, तब इस पैसे का इस्तेमाल कितना हुआ और क्यों नहीं हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं हम दो ने हमारे दो में से एक के लिए कहीं घुमाया गया या कोई घोटाला हुआ। उसके लिए बात जब निकली है तो दूर तक जाएगी दस्तावेजों को तलाशा जाना चाहिए। लेकिन पारदर्शिता मांगना घोटाले का आरोप लगाना नहीं है। आखिर जनता ने भरोसा करके पैसा दिया था। उसे यह जानने का अधिकार है कि कितना आया, कहां गया, कितना वापस आया और कितना सुरक्षित रखा गया। और आज जब फंड में हजारों करोड़ रुपये जमा हैं, तो यह सवाल भी अपनी जगह खड़ा है कि आपदा राहत के नाम पर जनता से पैसा लेकर उसे वर्षों तक जमा रखने की नीति क्या है? ताजा खातों में बड़ी राशि के साथ ३२४.६५ करोड़ रुपए की राशि ग्स्ज्तसहूग्हु aुाहम्गे द्वारा लौटाए जाने की बात भी सामने आई है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता जैसा आजकल नफरती विचारधारा के अनुयायी कहते हुए शोर मचाते है। सवाल यह भी नहीं कि पीएम केयर्स में पैसा क्यों है, सवाल यह है कि जिस जनता ने पैसा दिया, उसे उसका पूरा हिसाब क्यों न मिले? गरीब की जेब से निकला सौ रुपया भी उसके लिए बहुत बड़ा होता है। करोड़ों भारतीयों की कमाई सीमित है। ऐसे देश में राजनीतिक दलों, सरकारों और सार्वजनिक संस्थाओं के पास जमा हजारों करोड़ रुपये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, वे जनता के विश्वास की रकम हैं। इसलिए हिसाब मांगना शोर मात्र नहीं, नागरिक का अधिकार है। पैसा जनता का है तो सवाल भी जनता का होगा और जवाब भी सरकार को जनता को ही देना पड़ेगा और देना भी चाहिए बहानेबाजी नही चलेगी, न हिंदू-मुस्लिम की चादर से ढका जा सकता है। वह दौर खत्म हुआ, जब धार्मिक अफीम के नशे की चासनी में डुबकी लगाकर पाक-साफ होने का सर्टिफिकेट मिल जाता था। सत्यमेव जयते
राष्ट्रीय पर्व पर तिरंगा चमकेगा क्या गांधी की सादगी भी लौटेगी?
आजादी का दिन हो, गणतंत्र दिवस हो, गांधी जयंती हो या कोई और राष्ट्रीय पर्व सरकारी इमारतों, स्कूलों और राजनीतिक दलों के कार्यालयों पर तिरंगा फहरता है। तिरंगा देखकर मन में देश आता है, स्वतंत्रता संग्राम आता है और उस संघर्ष के वे चेहरे याद आते हैं, जिन्होंने अपने जीवन को देश के नाम कर दिया और वह मुखबिर याद आते हैं, जिनकी वजह से आजादी के दीवानों को यातनाए झेलनी व फांसी के तख्ते पर झूलना पड़ा। आज वही आईडियोलॉजी हमें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रही है, खैर उससे कोई फर्क नही पड़ता गांधीवादियों पर। यह तो वे खुद भी जानते है कि हमें ज्ञान देने का हक नही है। लेकिन असल सवाल यह है कि जिस तिरंगे के नीचे हम गांधी को याद करते हैं, क्या उसकी परंपरा भी हमें याद है? कभी राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों और बीच के चक्र का नाम नहीं था। उसके साथ खादी जुड़ी थी। खादी केवल कपड़ा नहीं थी, वह विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार से लेकर आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान तक की राजनीतिक भाषा थी।
चरखा गांधी के लिए मशीन का विरोध नहीं, बल्कि उस गरीब भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने का प्रतीक था, जिसे अंग्रेजी अर्थव्यवस्था ने सबसे अधिक चोट पहुंचाई थी। आज स्थिति यह है कि बाजार में सस्ते, चमकीले और कई बार चीन में बने तिरंगे आसानी से मिल जाते हैं। राष्ट्रीय पर्व आते ही वे दुकानों से लेकर कार्यालयों तक पहुंच जाते हैं। सवाल किसी विदेशी वस्तु के प्रति पूर्वाग्रह का नहीं, सवाल उस प्रतीक की आत्मा को समझने का है। जब राष्ट्रीय ध्वज स्वयं हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति से जुड़ा हुआ है, तो उसके निर्माण में स्वदेशी और खादी की परंपरा को प्राथमिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? और यह सवाल कांग्रेस से ज्यादा किससे पूछा जाए? वह पार्टी जो महात्मा गांधी को अपनी राजनीतिक विरासत का सबसे बड़ा नैतिक आधार मानती है और है भी इसमें किसी को शक भी नहीं है। कांग्रेस के कार्यालयों में अगर तिरंगा फहराया जाए तो क्या वह गांधी के चरखे और खादी की स्मृति से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए? बात केवल झंडे की नहीं है। बात उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसकी पहचान कभी गांधीवादी सादगी हुआ करती थी। खादी का कुर्ता, गांधी टोपी, सदरी या वास्कट ये कपड़े मात्र नहीं थे। जनता और जनसेवक के बीच दूरी घटाने वाले प्रतीक थे। आज नेता जितना अधिक चमकदार और पैâशनेबल होता जा रहा है, उतना ही वह उस साधारण भारत से दूर दिखाई देता है जिसके नाम पर राजनीति की जाती है। कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के नेताओं से लेकर उसके बड़े नेताओं तक गांधीवादी पहनावे का वह आग्रह लगभग गायब होता दिखाई देता है। राहुल गांधी भी आधुनिक भारतीय नेता की अपनी अलग छवि में दिखाई देते हैं। यह उनका व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है, लेकिन कांग्रेस के लिए सवाल व्यक्तिगत पसंद से बड़ा है। अगर गांधी कांग्रेस की आत्मा हैं तो गांधी की सादगी, स्वदेशी और खादी की परंपरा केवल भाषणों और तस्वीरों में क्यों रहे? किसी नेता पर टोपी थोपना गांधीवाद नहीं है। मगर कांग्रेस चाहे तो अपने संगठन में खादी को प्रोत्साहित कर सकती है, राष्ट्रीय पर्वों पर खादी के तिरंगे को प्राथमिकता दे सकती है और अपने कार्यकर्ताओं के बीच गांधीवादी सादगी को फिर से राजनीतिक संस्कार बना सकती है। गांधी को माला पहनाना आसान है, गांधी को पहनना कठिन। तिरंगा फहराना आसान है, तिरंगे की आत्मा को समझना कठिन। कांग्रेस सचमुच गांधी के रास्ते पर चलने का दावा करती है और वह चलती भी है लेकिन उसे गांधी को वैâलेंडर से निकालकर अपने व्यवहार में लाना होगा। क्योंकि गांधी की सबसे बड़ी पहचान उनका चेहरा नहीं, उनका चरखा था, उनका चश्मा नहीं, उनकी सादगी थी, और उनका स्मारक नहीं, उनका विचार था। तिरंगा खादी का हो, राजनीति सादगी की हो और गांधी तस्वीर से निकलकर फिर संगठन के चरित्र में दिखाई दें शायद यही उस परंपरा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सत्यमेव जयते
