मुख्यपृष्ठधर्म विशेषशिवकृपा से काम क्रोध और लोभ पर विजय

शिवकृपा से काम क्रोध और लोभ पर विजय

शीतल अवस्थी 

त्रिपुरासुर नामक दैत्य का संहार अत्यंत कठिन था। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका अंत तभी होगा जब उसके द्वारा आकाश में निर्मित तीन नगरों (पुरों) पर कोई एक ही साथ प्रहार करने में सफल हो। अंततोगत्वा यह कार्य भगवान शंकर को सौंपा गया तथा त्रिपुरासुर का संहार करने के कारण उन्हें ‘त्रिपुरारी’ कहा जाने लगा। ‘त्रिपुर’ का आध्यात्मिक तात्पर्य काम, क्रोध और लोभ रूपी तीनों पुरों से है तथा उनमें निवास करने वाला दैत्य ‘मन’ है। मन इतना चंचल है कि कभी काम के, कभी क्रोध तथा कभी लोभ के नगर में जा बसता है। स्थिति ऐसी बन पड़ती है कि यदि एक को जीत लें तो मन दूसरे में जा फंसता है। अभिप्राय यह कि तीनों नगरों में जा छिपने वाले इस मनरूपी दैत्य पर एक साथ प्रहार होना चाहिए। अन्यथा काम, क्रोध और लोभ में से एक न एक जीवित रह जाएगा। स्पष्ट है, मात्र जीव के प्रयास से नहीं, केवल शिवकृपा से काम, क्रोध और लोभ पर विजय संभव है।
बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। सावन में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया। इस दौरान डाकू जिस पेड़ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेड़ था और परेशान डाकू पेड़ से पत्तों को तोड़कर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। अचानक हुई शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था, उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्व और बढ़ गया।

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