-जेन-जी आंदोलन के बाद अब विभिन्न राज्यों में तेज हुए विरोध
-प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष का निशाना सीधे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर
नई दिल्ली। जेन-जी आंदोलन ने जिस इस्तीफा राजनीति की शुरुआत शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान से कराई थी, उसकी गूंज अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह तक पहुंचती दिखाई दे रही है। दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक, राम मंदिर चढ़ावा विवाद और दूसरे मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार मोदी-शाह की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है।
२० जुलाई को दिल्ली में जेन-जी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों से इस्तीफे की मांग की थी। उनका आरोप था कि छात्रों के खिलाफ जिस तरह बल प्रयोग हुआ, उसकी जिम्मेदारी सिर्फ शिक्षा मंत्री तक सीमित नहीं रह सकती। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी अमित शाह से माफी और इस्तीफे की मांग उठाई। खरगे ने राज्यसभा में पेपर लीक और छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरकार को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए।
पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही किसकी?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस पूरे आंदोलन का पहला बड़ा राजनीतिक परिणाम बना। २५ जुलाई को उनके पद छोड़ने के बाद जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने इसे अपनी जीत बताया। रिपोर्ट के मुताबिक, हजारों युवाओं ने जंतर-मंतर पर इसे आंदोलन की बड़ी सफलता के रूप में मनाया। लेकिन आंदोलन वहीं खत्म नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि अगर शिक्षा मंत्री को पेपर लीक और छात्रों के आक्रोश की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी तो २० जुलाई की पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही किसकी होगी?
संसद में भी उठे सवाल
अमित शाह के इस्तीफे की मांग अब केवल दिल्ली तक भी सीमित नहीं है। २६ अगस्त को हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर में युवा कांग्रेस ने पेपर लीक और छात्र कार्रवाई के मुद्दे पर अमित शाह के इस्तीफे की मांग दोहराई। इसी बीच संसद में विपक्ष मोदी और शाह से लगातार जवाब मांगता रहा। राम मंदिर चढ़ावा विवाद और छात्रों पर कार्रवाई के मुद्दे पर दोनों नेताओं की संसद में मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठे।
भाजपा की बढ़ी परेशानी
मोदी सरकार के १२ वर्षों में मंत्रियों के इस्तीफे की मांग कई बार उठी, लेकिन सत्ता शायद ही कभी सड़क के दबाव के आगे झुकी। जेन-जी आंदोलन ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। धर्मेंद्र प्रधान का जाना युवाओं को यह संदेश दे गया कि लगातार दबाव बनाया जाए तो सरकार को पीछे हटाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे मोदी सरकार के लिए असामान्य राजनीतिक झटका माना। यही कारण है कि अब हर नए आंदोलन में ‘इस्तीफा’ पहले से अधिक ताकतवर राजनीतिक नारा बनता जा रहा है।
आक्रामक हुआ विपक्ष
पहले मांग थी- धर्मेंद्र प्रधान हटाओ। प्रधान गए। अब नारा है- जवाब अमित शाह दें। और विपक्ष इससे एक कदम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री तक राजनीतिक जिम्मेदारी पहुंचा रहा है।
शाह क्यों निशाने पर?
दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है। इसीलिए २० जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्ष का सीधा निशाना अमित शाह बने। राहुल गांधी और खरगे दोनों उनकी जवाबदेही और इस्तीफे की मांग उठा चुके हैं। जब एक मंत्री सड़क के दबाव में जा सकता है तो बाकी सत्ता कितनी सुरक्षित है? कल तक सरकार आंदोलनकारियों से पूछ रही थी- ‘तुम कौन हो?’ अब आंदोलनकारी पूछ रहे हैं- ‘अगला इस्तीफा किसका?’
प्रधान के बाद किसका नंबर?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने आंदोलनों की राजनीति का मनोविज्ञान बदल दिया है। अब प्रदर्शनकारी जानते हैं कि दबाव बेअसर नहीं है। यही मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
