कविता श्रीवास्तव
क्रिकेट के मैदान पर जुनून, आक्रामकता और प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब यही आक्रामकता व्यक्तिगत टकराव तक पहुंच जाए, तो खिलाड़ी के व्यवहार और खेल की मर्यादा दोनों पर चर्चा स्वाभाविक है। भारत और श्रीलंका के बीच कोलंबो में हुए दूसरे टेस्ट में यशस्वी जायसवाल और असिथा फर्नांडो के बीच हुआ विवाद चर्चा में है। यशस्वी को ४५ रन पर आउट करने के बाद फर्नांडो ने हरकत की तो यशस्वी भी पलटे। दोनों खिलाड़ियों के बीच हुई बहस ने माहौल गरमा दिया। दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए और उनके सिर आपस में टकराए। साथी खिलाड़ियों ने बीच-बचाव कर स्थिति संभाली। आईसीसी ने इस घटना को गंभीरता से लिया। दोनों पर मैच फीस का २५ प्रतिशत जुर्माना लगाया और उनके रिकॉर्ड में एक-एक डिमेरिट पॉइंट जोड़ा। दोनों ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। लेकिन कहानी में दूसरा अध्याय भी आया। कमेंटेटर हर्षा भोगले ने सोशल मीडिया पर कहा कि संभवत: फर्नांडो ने कुछ ऐसा कहा हो जो नहीं कहा जाना चाहिए था, लेकिन यशस्वी को वहां से चले जाना चाहिए था। इस पर यशस्वी ने जवाब दिया कि अगर किसी को यह नहीं पता कि मैदान पर उनसे क्या कहा गया, तो उन्हें इस घटना पर पैâसला नहीं सुनाना चाहिए। उन्होंने आगे लिखा कि अगर कोई सीमा पार करता है तो ‘दिस इंडिया विल फाइट एंड रिप्लाई।’ यशस्वी की बात में महत्वपूर्ण सवाल है कि किसी घटना का पूरा संदर्भ जाने बिना किसी खिलाड़ी को दोषी ठहराना कितना उचित है? मैदान पर क्या बातचीत हुई, किसने क्या कहा और मामला क्यों बिगड़ा, यह दर्शकों को दिखाई नहीं देता। यशस्वी के भीतर लड़ने का जज्बा ठीक है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में महानता केवल विरोधी को जवाब देने में नहीं, बल्कि यह तय करने में भी है कि कब जवाब देना है और कब चुपचाप आगे बढ़ जाना है। भारतीय टीम के बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक ने भी कहा कि यशस्वी को फर्नांडो के इतने करीब नहीं जाना चाहिए था। यानी टीम के भीतर से भी संयम की जरूरत की बात सामने आई। यशस्वी का ‘यह भारत है, लड़ेगा और जवाब देगा’ वाला जज्बा प्रशंसकों को रोमांचित कर सकता है, लेकिन भारतीय क्रिकेट की पहचान केवल ऐसे जज्बाती कथन मात्र से नहीं रही है। मैदान पर बल्ले से जवाब देना, बेहतर प्रदर्शन से देना और जीत से देना कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। हर्षा भोगले की आलोचना को भी उचित राय मानना सही नहीं होगा और यशस्वी के जवाब को भी पूरी तरह सही ठहराना उचित नहीं। दोनों पक्षों में अपनी-अपनी बात है। लेकिन इस पूरे विवाद से यशस्वी के लिए एक बड़ी सीख जरूर निकलती है कि लड़ने का जज्बा जरूर हो, लेकिन उस पर नियंत्रण भी जरूरी है। हर उकसावे का जवाब देना जरूरी नहीं है। एक क्रिकेटर को अपना सही जवाब पिच पर तगड़ा शॉट लगाकर ही देना चाहिए।
