अरुण कुमार गुप्ता
मोदी सरकार की भूख, लूट और अदूरदर्शिता का सबूत इथेनॉल से बड़ा क्या हो सकता है। मोदी सरकार ने यह कह कर पहले पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना शुरू किया कि बाहर से आने वाले तेल का आयात कम होगा। तेल का आयात कम होगा तो रुपया बाहर जाने से बचेगा और डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होगा। सरकार ने न लोगों की परवाह की न ही पर्यावरण की और न ही लोगों की गाड़ियों की। गन्ने से अंधाधुंध इथेनॉल बनाना शुरू कर दिया। २५ लाख टन गन्ना जो कि चीनी बनाने के काम आने वाला था उससे भी इथेनॉल बना डाला। जब मोदी सरकार को लगा कि गन्ना तो अब खत्म होने लगा है तो मक्के से इथेनॉल बनाना शुरू किया। इस सरकार की हवस इतने से भी खत्म नहीं हुई। इन अक्ल के अंधों की वजह से देश में चीनी की कमी हो गई और नतीजे में चीनी के दाम बेतहाशा बढ़ने लगे तो चीनी आयात करने लगे। वह भी ड्यूटी प्रâी, ताकि लोगों को रोटी न सही कम से कम चाय तो मिल ही जाए। जो चीनी भारत निर्यात करता था, इन नकारा लोगों की वजह से आयात करना पड़ा। दूसरी बात मक्का पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों को खिलाने के काम आता था, लेकिन मक्के से तो मोदी के मंत्री ने इथेनॉल बना डाला और पोल्ट्री फार्म में मक्के की कमी हो गई। इसके बाद पोल्ट्री फार्म वालों ने मक्के की जगह मुर्गियों को दूसरा महंगा फीड देना शुरू किया, जो मक्के से ज्यादा महंगा था। नतीजे में मार्वेâट में अब अंडे भी महंगे हो गए हैं। आपने वह कहावत जरूर सुनी होगी- अंधेर नगरी चौपट राजा…। तो देश की कुर्सी पर चौपट राजा ही बैठा है। इसने तो देश में रायता पैâला दिया। अब देश के लोग इसे भुगतते रहें।
ईमानदार नेताओं के पुल!
देश में हाईवे, एक्सप्रेसवे और पुलों का जाल बिछाने को विकास का सबसे बड़ा प्रमाण बताया जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ पुलों के गिरने और पुलों पर दरारें, गड्ढे तथा कंक्रीट उखड़ने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
२०२१ से २०२५ के बीच देशभर में १७० पुल ढहने की घटनाओं का मीडिया-आधारित संकलन सामने आया, जिनमें २०२ लोगों की मौत और ४४१ लोग घायल हुए हैं। सबसे चौंकाने वाली तस्वीर बिहार की है। २०२४ में कुछ ही हफ्तों के भीतर लगातार पुल गिरने की घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान खींचा। जुलाई २०२४ तक बिहार में १८ पुलों के पिछले दो वर्षों में गिरने की बात सामने आई थी, जिनमें १२ पुल सिर्फ २० दिनों में ढहे थे। २०२६ में भी यह सिलसिला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। ४ मई २०२६ को भागलपुर के विक्रमशिला सेतु का करीब २५ मीटर का स्लैब गंगा में गिर गया। हादसे में जान-माल का बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन पुल पर यातायात रोकना पड़ा। जुलाई २०२५ में गुजरात के वडोदरा का गंभीरा पुल ढहने से कई लोगों की जान गई। १५ जून २०२५ को पुणे के कुंडमाला क्षेत्र में इंद्रायणी नदी पर बना पुल ढह गया। हादसे में कम से कम दो लोगों की मौत हुई और ३२ लोग घायल हुए। अब बात कर लेते हैं अंग्रेजों के जमाने के पुलों की। अंग्रेजों ने देशभर में ६ बड़े ब्रिज ऐसे बनाए जो आज १०० साल बाद भी सीना तानकर खड़े हैं। पहले बिहार का कोयरवर ब्रिज जो १८६२ में बनाया गया था। दूसरा प्रयागराज का ओल्ड नैनी ब्रिज जो १८६५ में बना था। तीसरा दिल्ली का ओल्ड यमुना ब्रिज जो १८६६ में बना था। चौथा मध्य प्रदेश का तावा रेलवे ब्रिज जो १८७० में बना था। पांचवां पश्चिम बंगाल का कोरनेशन ब्रिज जो १९४१ में बना। कोलकाता का हावड़ा ब्रिज जो १९४३ में बना था। अंग्रेजों के पुल १०० साल बाद भी खड़े हैं और भारत के ईमानदार नेताओं के पुल सालभर में ही गिर जा रहे हैं।
