मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात: ड्रेस-कोड विवाद हिजाब, हया और हाई कोर्ट

इस्लाम की बात: ड्रेस-कोड विवाद हिजाब, हया और हाई कोर्ट

सैयद सलमान / मुंबई

कपड़े कभी सिर्फ कपड़े नहीं होते। वे पहचान की भाषा बोलते हैं, आस्था का इशारा करते हैं और कभी-कभी सत्ता और स्वतंत्रता की जंग का मैदान भी बन जाते हैं। हिजाब पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का ताजा पैâसला ऐसी ही एक पुरानी बहस को फिर सतह पर ले आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब किसी संस्थान का ड्रेस कोड समान, तटस्थ और गैर-भेदभावपूर्ण हो, तब केवल व्यक्तिगत दावे के आधार पर उसमें अपवाद की मांग नहीं की जा सकती और न ही बिना अकाट्य प्रमाण के किसी प्रथा को संविधान के तहत ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ माना जा सकता है। वर्तमान में अदालत के इस फैसले को कानूनी चश्मे से न देखकर, इस्लाम की व्यापक बौद्धिक परंपरा और वैश्विक अनुभवों की रोशनी में परखने की जरूरत है।
कुरआन की आयतों की व्याख्याएं
दिलचस्प बात यह है कि सिर ढंकने की परंपरा इस्लाम से पुरानी है। यहूदी, ईसाई और पारसी समाजों में भी शालीनता और मर्यादा के प्रतीक के रूप में स्त्रियां सिर ढंकती रही हैं। मध्य-पूर्व के प्राचीन शहरी समाजों में यह परंपरा अक्सर सामाजिक प्रतिष्ठा और वर्ग की निशानी भी हुआ करती थी। इस्लाम ने इस प्रचलित रिवाज को अपनाया, मगर उसे नैतिकता और आत्म-मर्यादा के व्यापक ढांचे में पिरो दिया। यही वजह है कि कुरआन की आयतें केवल परिधान का उल्लेख नहीं करतीं, बल्कि आंख, वाणी और आचरण की शालीनता को भी उतना ही महत्व देती हैं। मुस्लिम चिंतकों ने इस फर्क को बार-बार रेखांकित किया है कि धार्मिक ग्रंथ की मूल भावना और उसके इर्द-गिर्द बनी सामाजिक-पितृसत्तात्मक व्याख्याएं दो अलग चीजें हैं।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हिजाब के सवाल से निपटने के तरीके भी बेहद विरोधाभासी, पेचीदा और कठिन रहे हैं। फ्रांस ने अपने कट्टर विचारों के तहत सार्वजनिक संस्थानों में हिजाब पर पाबंदी लगाई तो ईरान ने इसे कानूनन अनिवार्य बना दिया। तुर्की ने दशकों तक इस पर प्रतिबंध रखने के बाद बीते वर्षों में सार्वजनिक संस्थानों में इसकी अनुमति दी। भारत का संवैधानिक ढांचा इन दोनों अतियों से अलग एक तीसरा रास्ता तलाशता है, जहां न तो राज्य किसी धार्मिक प्रतीक को थोपता है, न ही उसे पूरी तरह प्रतिबंधित करता है, बल्कि संस्थागत तटस्थता और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता है। यह संतुलन मुश्किल जरूर है, पर यही बहुलतावादी लोकतंत्र की असली परीक्षा भी है।
चिंतन-मनन के व्यावहारिक पहलू
समय के साथ इस इस्लामी सोच के दो मुख्य प्रवाह उभरे हैं। एक तरफ पारंपरिक विधिक दृष्टिकोण अर्थात फिक्ह है, जो बालिग स्त्री के लिए चेहरे और हथेलियों को छोड़कर पूरे शरीर को ढंकना एक धार्मिक कर्तव्य (फर्ज), इबादत, आज्ञाकारिता और सामाजिक शुचिता का अभिन्न अंग मानता है। वहीं दूसरी ओर, आधुनिक और सुधारवादी मुस्लिम विचारकों का वर्ग इन आदेशों को सातवीं सदी के अरब समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक और सुरक्षात्मक परिस्थितियों के संदर्भ में देखता है। इस वर्ग का तर्क है कि धर्म की आत्मा बाह्य आवरण में नहीं, बल्कि आचरण की मर्यादा में बसती है। आधुनिक दुनिया में कई मुस्लिम महिलाएं हिजाब को अपनी स्वायत्तता, व्यक्तिगत पहचान और सांस्कृतिक गौरव की अभिव्यक्ति के रूप में स्वेच्छा से चुनती हैं, वहीं कई अन्य महिलाएं बिना सिर ढंके भी उसी धार्मिक निष्ठा और शालीनता के साथ समाज के हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं।
इस पूरे चिंतन-मनन का एक व्यावहारिक पहलू भी है, जिस पर अक्सर कम बात होती है। स्कूली शिक्षा तक लड़कियों की पहुंच इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब भी ड्रेस कोड को लेकर टकराव होता है, सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्राओं को उठाना पड़ता है जो पहले से सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं। कर्नाटक में हिजाब विवाद के दौरान देखा गया कि वैâसे कई छात्राएं महीनों तक कक्षा से दूर रहीं और कुछ ने तो स्कूल छोड़ना तक बेहतर समझा। ऐसे में सवाल केवल कानूनी अधिकार का नहीं, बल्कि यह भी है कि बेटियों को शिक्षा के दरवाजे तक बिना रुकावट कैसे पहुंचाया जाए।
असल चुनौती हिजाब के सही या गलत होने की नहीं, बल्कि यह है कि आस्था की विविधता को सार्वजनिक जीवन की साझा संरचना के भीतर वैâसे समाहित किया जाए। मुस्लिम समाज को यह बात समझनी होगी कि धार्मिक पहचान और बच्चियों के भविष्य का रास्ता टकराव के बजाय साझा संवाद में है। वहीं सरकार और समाज को भी यह समझना होगा कि तटस्थता का मतलब किसी एक समुदाय की आस्था को हाशिए पर धकेलना नहीं, बल्कि सबको बराबर अवसर देना है।
कुल मिलाकर, हिजाब की यह बहस किसी अदालती फैसले से खत्म नहीं होगी। प्रगतिशील समाज वही है जो अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान करते हुए भी आधुनिक संस्थानों की निष्पक्षता और समानता के उसूलों को खुले दिल से स्वीकार करे। आस्था जब अनुशासन से हाथ मिलाती है, तभी ज्ञान और समरसता का मार्ग प्रशस्त होता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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