-देशमुख का दावा, पश्चिम बंगाल का फायदा हटाएं तो भाजपा की तस्वीर और बिगड़ेगी
-जेन-जी से ज्यादा जेन-एक्स की नाराजगी बन चुकी है खतरा; यूजीसी ने कुरेद दिए मंडल दौर के पुराने जख्म
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जिन राजनीतिक नैरेटिव, मजबूत संगठन और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे भाजपा ने पिछले करीब १२ वर्षों तक राष्ट्रीय राजनीति पर दबदबा बनाए रखा, उसी भाजपा के लिए पिछले १२ हफ्तों के घटनाक्रम खतरे की घंटी बजाते दिखाई दे रहे हैं। सी-वोटर के संस्थापक और चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख की ताजा टिप्पणी इस राजनीतिक बदलाव को और गंभीर बना देती है।
युवा ही नहीं, उनके माता-पिता भी खिसक रहे
इंडिया टुडे के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे पर चर्चा के दौरान देशमुख ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा को मिले लाभ को अलग करके देखा जाए तो दूसरे राज्यों में उसकी स्थिति काफी कमजोर दिखाई देती है। उन्होंने मौजूदा दौर को अपने अनुभव के आधार पर भाजपा के पिछले १२ वर्षों के शासनकाल का संभवतः सबसे बड़ा संकट तक बताया। देशमुख का संकेत है कि बंगाल की असाधारण बढ़त हटा दी जाए तो बाकी देश का राजनीतिक संदेश भाजपा के लिए कहीं अधिक चिंताजनक दिखाई देता है।
अब तक माना जा रहा था कि भाजपा के लिए सबसे बड़ा संकट जेन-ज़ी की नाराजगी है, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियां, पेपर लीक, नीट जैसे विवाद और शिक्षा तथा रोजगार को लेकर बढ़ती बेचैनी इसका कारण हैं। सी-वोटर के एक अलग युवा सर्वे में भी ५३ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में रखा, जबकि लगभग ५९ प्रतिशत ने माना कि राजनीतिक दल युवाओं की चिंताओं को समझ ही नहीं रहे। लेकिन देशमुख इससे भी बड़ा खतरा जेन-एक्स में देखते हैं। उनका कहना है कि यूजीसी के इक्विटी नियमों ने उस पीढ़ी की पुरानी स्मृतियों को फिर जगा दिया है जिसने १९८९-९० के मंडल आंदोलन का दौर अपनी आंखों के सामने देखा और झेला था। यही जेन-एक्स आज जेन-ज़ी का माता-पिता वर्ग है। उसे आशंका है कि तीन दशक पहले जिस सामाजिक और शैक्षणिक उथल-पुथल का सामना उसने किया, कहीं वैसी परिस्थितियां अब उसकी अगली पीढ़ी के सामने न खड़ी हो जाएं। यही कारण है कि यूजीसी का विवाद भाजपा के लिए सामान्य छात्र आंदोलन भर नहीं रह गया है। इसका असर उसके पारंपरिक सवर्ण मतदाता आधार तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
यूपी का आंकड़ा बजा रहा खतरे की घंटी
उत्तर प्रदेश इसके सबसे स्पष्ट संकेत दे रहा है। जनवरी २०२६ के सर्वे में एनडीए को यहां ४८ लोकसभा सीटों का अनुमान था। अगस्त के सर्वे में इंडिया गठबंधन ४१ और एनडीए ३८ सीटों पर दिखाई दिया। यानी कुछ महीनों में राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदली है। देशमुख के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में इस बदलाव को केवल अयोध्या या सामान्य सत्ता-विरोधी लहर से समझना पर्याप्त नहीं होगा। यूजीसी नियमों को लेकर जेन-एक्स अभिभावकों की बेचैनी महत्वपूर्ण कारण है। यानी भाजपा के सामने एक साथ दो पीढ़ियों का सवाल खड़ा हो रहा है। जेन-ज़ी पूछ रही है, नौकरी कहां है, परीक्षाएं सुरक्षित क्यों नहीं हैं और शिक्षा व्यवस्था भरोसेमंद क्यों नहीं है? जेन-एक्स पूछ रही है, हमारे बच्चों के भविष्य की व्यवस्था वैâसी होगी? इसके ऊपर ई-२० पेट्रोल, महंगाई और रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियां पहले से मौजूद हैं। अलग-अलग असंतोष यदि एक साझा राजनीतिक भावना में बदलने लगे, तो भाजपा के लिए समस्या केवल कुछ सीटों के घटने की नहीं होगी; वह उस राजनीतिक नैरेटिव के कमजोर होने का संकेत होगा, जिसे पिछले एक दशक से चुनाव जिताने वाली उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता रहा है। सबसे महत्वपूर्ण संकेत शायद यही है, जिस सत्ता ने वर्षों तक देश का राजनीतिक नैरेटिव तय किया, उसे पहली बार अलग-अलग मोर्चों पर जनता द्वारा तय किए जा रहे नैरेटिव का पीछा करना पड़ रहा है।
