मुख्यपृष्ठनए समाचारदुर्गाकुंड मंदिर : देवी की कृपा और रक्तकुंड की अनोखी कहानी

दुर्गाकुंड मंदिर : देवी की कृपा और रक्तकुंड की अनोखी कहानी

हिमांशु राज / वाराणसी

काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, लेकिन यहां शक्ति उपासना की परंपरा भी उतनी ही प्राचीन है। दुर्गाकुंड स्थित मां दुर्गा का मंदिर इसी आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहां देवी ने शुंभ और निशुंभ का वध करने के बाद विश्राम किया था। मंदिर से जुड़ी कथाओं में इसे राजाओं के रक्त से बने कुंड और देवी की प्रत्यक्ष उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार, काशी के प्राचीन स्वरूप में केवल तीन प्रमुख मंदिर माने जाते थे—काशी विश्वनाथ, मां अन्नपूर्णा और मां दुर्गा का मंदिर। दुर्गा मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में भी श्रद्धा प्राप्त है। भक्तों का विश्वास है कि यहां मां भगवती सच्चे मन से की गई पुकार सुनती हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। इसके स्थान पर श्रीशक्ति यंत्र स्थापित है, जिस पर देवी का मुखौटा लगाया जाता है। इसी के साथ मां की चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है। मान्यता है कि जिस स्थान पर देवी स्वयं प्रकट हुई हों, वहां अलग से उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती।
दुर्गा मंदिर की स्थापना बीसा यंत्र पर किए जाने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता में बीसा यंत्र को शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस यंत्र की उपस्थिति से मंदिर परिसर में विशेष आध्यात्मिक वातावरण बना रहता है। मंदिर में स्थापित श्रीशक्ति यंत्र को अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। भक्तों की धारणा है कि देवी के इस स्वरूप के दर्शन और पूजा से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है।
दुर्गाकुंड से जुड़ी सबसे चर्चित कथा काशी नरेश सुबाहू की पुत्री जया और अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन से संबंधित है। कहा जाता है कि जया बचपन से ही मां दुर्गा की उपासक थीं। विवाह योग्य होने पर राजा सुबाहू ने उनके लिए स्वयंवर आयोजित किया और देशभर के राजाओं को आमंत्रित किया।
स्वयंवर से एक रात पहले जया ने स्वप्न देखा कि उनका विवाह राजकुमार सुदर्शन से होगा। उन्होंने यह बात अपने पिता को बताई। राजा सुबाहू ने सभा में मौजूद राजाओं के सामने अपनी पुत्री की इच्छा प्रकट कर दी। इससे अन्य राजा क्रोधित हो उठे और उन्होंने सुदर्शन को युद्ध की चुनौती दे दी।
राजकुमार सुदर्शन ने देवी का स्मरण कर उनसे सहायता मांगी। मान्यता है कि उनकी प्रार्थना सुनकर मां भवानी प्रकट हुईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। कथा के अनुसार, देवी ने सुदर्शन को अपने संरक्षण में लिया और युद्ध के लिए खड़े राजाओं का वध कर दिया। इस युद्ध में बहा रक्त इतना अधिक था कि वहां एक कुंड बन गया, जिसे रक्तकुंड कहा गया।
जया और सुदर्शन ने देवी से प्रार्थना की कि इस रक्तकुंड को जलाशय में बदल दिया जाए। देवी के आशीर्वाद से वह स्थान कुंड में परिवर्तित हो गया। यही कुंड आगे चलकर दुर्गाकुंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लोकविश्वास है कि कुंड का जल कभी पूरी तरह सूखता नहीं और इसे देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य कथा में लुटेरों के एक दल का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उन्होंने देवी से मन्नत मांगी थी कि लूट में सफलता मिलने पर वे नरबलि देंगे। सफलता मिलने के बाद वे एक निष्पाप व्यक्ति की तलाश करने लगे, लेकिन उन्हें कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिला। उनकी नजर मंदिर के पुजारी पर पड़ी। पुजारी ने परिस्थिति को समझते हुए अंतिम बार मां दुर्गा की पूजा करने की अनुमति मांगी। पूजा पूरी होने के बाद लुटेरों ने उनकी बलि दे दी।
मान्यता है कि इसके बाद देवी प्रकट हुईं और उन्होंने पुजारी को जीवनदान दिया। देवी ने पुजारी को अपने चरणों में स्थान देने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके दर्शन के बाद पुजारी के दर्शन किए बिना देवी की पूजा का फल पूर्ण नहीं माना जाएगा। पुजारी के देह त्यागने के बाद मंदिर परिसर में ही उनकी समाधि बनाई गई। इसे कुक्कुटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। आज भी श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के बाद कुक्कुटेश्वर महादेव की पूजा करते हैं।
दुर्गा मंदिर का वर्तमान स्वरूप लगभग 18वीं सदी का माना जाता है। वर्ष 1760 में बंगाल की रानी भवानी ने लाल पत्थरों से बने इस मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की स्थापत्य शैली नागर परंपरा से प्रभावित है। मंदिर के चारों ओर बना बरामदा पेशवा बाजीराव द्वितीय से जुड़ा माना जाता है। दुर्गाकुंड को पक्का कराने का श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को दिया जाता है। मंदिर परिसर में लगे विशाल घंटे नेपाल नरेश की ओर से भेंट किए जाने की मान्यता है।
मंदिर परिसर में मां भद्रकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, भगवान शिव, हनुमान, राधा-कृष्ण और गणेश जी के मंदिर भी हैं। चंड भैरव की उपस्थिति के कारण भी इस स्थान का धार्मिक महत्व बढ़ जाता है। शुक्रवार को मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सावन के पूरे महीने यहां विशेष धार्मिक आयोजन और मेला लगता है। नवरात्र के दौरान भी मंदिर में भक्तों की भीड़ रहती है। शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर मां के कूष्मांडा स्वरूप की पूजा का विशेष विधान बताया जाता है।
मंदिर में सुबह चार बजे से दोपहर 12 बजे तक दर्शन होते हैं। इसके बाद दोपहर एक बजे से रात 10 बजे तक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। सुबह की आरती पांच बजे और शयन आरती रात नौ बजे होती है। दुर्गा मंदिर वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। शहर के विभिन्न हिस्सों से यहां सड़क मार्ग के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है। श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि काशी की पुरातन शक्ति परंपरा, लोककथाओं और स्थापत्य विरासत का जीवंत प्रतीक भी है।

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