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सीएपीएफ में ‘आईपीएस लॉबी’ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त!

-गृह मंत्रालय से पूछा, क्या अपने बलों में वरिष्ठ पद संभालने लायक अफसर नहीं?
-कोर्ट के पुराने आदेश के बाद नया कानून लाने पर घिरी सरकार,
-हजारों सीएपीएफ अफसरों की पदोन्नति का सवाल

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

देश की सीमाओं से लेकर नक्सल मोर्चे और आंतरिक सुरक्षा तक जान जोखिम में डालने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों की पदोन्नति और शीर्ष पदों पर नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में कठिन सवालों से घिर गई है। विवाद की जड़ सीएपीएफ के वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति है। सीएपीएफ के अपने वैâडर अधिकारियों का आरोप है कि दशकों तक सेवा देने के बावजूद उनके ऊपर वरिष्ठ पदों पर बाहर से आईपीएस अधिकारियों को बैठा दिया जाता है, जिससे उनकी पदोन्नति का रास्ता रुक जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने २३ मई २०२५ के एक अहम पैâसले में सीएपीएफ के ग्रुप-ए अधिकारियों को ऑर्गेनाइज्दड ग्रुप ए सर्विस का दर्जा देते हुए आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति क्रमश: कम करने की दिशा में आदेश दिया था। लेकिन इसके बाद विवाद खत्म होने के बजाय और बढ़ गया। सीएपीएफ अधिकारियों ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय ने अदालत के पैâसले को लागू नहीं किया। सेवानिवृत्त अधिकारियों की ओर से गृह सचिव के खिलाफ अवमानना याचिका तक दाखिल कर दी गई। इसी दौरान केंद्र सरकार ने सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट, २०२६ बना दिया। नए कानून के तहत सीएपीएफ के अनेक वरिष्ठ पदों पर आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति जारी रखने का रास्ता खोल दिया गया।
सीएपीएफ अधिकारियों का आरोप है कि सरकार ने नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के पैâसले का प्रभाव ही खत्म करने की कोशिश की है।
४ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
२ सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के तेवर और तीखे दिखाई दिए। जस्टिस उज्जल भुइयां ने सरकार से पूछा कि क्या केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में ऐसे सक्षम अधिकारी नहीं हैं जो प्रबंधकीय और शीर्ष पद संभाल सकें?
अदालत ने सीएपीएफ के अपने अधिकारियों के करियर के कथित रूप से दबने पर भी चिंता जताई और वरिष्ठ पदों पर आईपीएस अधिकारियों की पकड़ के संदर्भ में मजबूत लॉबी होने की टिप्पणी की।
मामला इसलिए राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि सीएपीएफ सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं, जिसके मंत्री अमित शाह हैं। लेकिन मौजूदा न्यायिक स्थिति में यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अमित शाह को व्यक्तिगत रूप से अवमानना का नोटिस जारी किया है। अदालत के सवाल फिलहाल केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय की नीति और संबंधित अधिकारियों के पैâसलों पर केंद्रीत हैं।
क्या आईपीएस बन गए गृह मंत्रालय का ‘सत्ता-कवच’?
सीएपीएफ में वरिष्ठ पदों पर आईपीएस अधिकारियों की लगातार प्रतिनियुक्ति ने अब बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब सीआरपीएफ,बीएसएफ,सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के अपने अधिकारी दशकों तक नक्सल क्षेत्रों, सीमाओं और संवेदनशील इलाकों में कमान संभालते हैं, तो फिर शीर्ष पदों पर बाहर से आईपीएस अधिकारियों की जरूरत क्यों पड़ती है? सुप्रीम कोर्ट ने भी सीएपीएफ के अपने वैâडर अधिकारियों के करियर के दबने पर चिंता जताते हुए कथित ‘मजबूत लॉबी’ की ओर इशारा किया है। अदालत के पुराने पैâसले के बाद भी आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति जारी रहने पर गृह मंत्रालय से जवाब मांगा गया है। यहीं से राजनीतिक सवाल उठता है, क्या यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था है, या फिर गृह मंत्रालय ऐसी कमांड-चेन बनाए रखना चाहता है जिसमें शीर्ष सुरक्षा पदों पर उसी नौकरशाही ढांचे के अधिकारी बैठे रहें जिस पर केंद्र का सीधा प्रशासनिक नियंत्रण अधिक प्रभावी होता है? अभी ऐसा कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं है कि गृह मंत्री अमित शाह आईपीएस अधिकारियों को राजनीतिक ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन सीएपीएफ के अपने अधिकारियों को शीर्ष नेतृत्व से दूर रखने और आईपीएस प्रतिनियुक्ति जारी रखने की नीति ने इस आशंका और बहस को जरूर जन्म दिया है। सबसे बड़ा सवाल, सीएपीएफ को अपने अनुभवी कमांडर चाहिए या गृह मंत्रालय को अपनी पसंद की कमांड-चेन?

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