लोकमान्य तिलक ने जनजागृति के लिए सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। इसकी शुरुआत पुणे में हुई थी। उसी पुणे में गणेशोत्सव को लेकर `बवाल’ शुरू हो गया है। रविवार को जागरूक पुणेकरों ने सार्वजनिक उत्सव में डीजे, स्पीकर, लाउडस्पीकरों के बेधड़क, कर्कश इस्तेमाल के खिलाफ मोर्चा निकाला। पुणेकरों की ओर से इसे बढ़िया रिस्पॉन्स मिला। इस बहाने पुणेकर सड़कों पर उतरे, यह महत्वपूर्ण है। पुणे का गणेशोत्सव विशिष्ट होता है, कभी वह अधिक सांस्कृतिक और पारंपरिक था तथा उसका अभिमान पूरे महाराष्ट्र को था। अब उत्सव का रूपांतरण एक तरह से `गृहयुद्ध’ में हो गया है। उसके खिलाफ पुणेकर चौंककर जाग उठे हैं। डीजे वगैरह का कानफोड़ू इस्तेमाल करके ‘उत्सव’ वाले कौन-सा आनंद मनाने वाले हैं? यह सवाल पूछा गया है। गणपति एक जागरूक देवता हैं। वे विद्या, कला और संस्कृति के प्रतीक हैं। वे जागे हुए ही हैं। फिर उनके आगमन के अवसर पर `भूकंप’ की तरह झटके देने वाले `डीजे’ क्यों बजाने हैं? रामायण में युद्ध शुरू होते समय रावण को कुंभकर्ण की जरूरत पड़ी, लेकिन उसकी नींद भयंकर थी, इसलिए उसे जगाने के लिए रावण ने भांति-भांति के उपाय किए। उसके शरीर पर हाथी चलाए, ढोल-नगाड़े और शंख बजाए, आसपास लोगों की भीड़ की और कर्कश गर्जना करके उसे उठाने की कोशिश की। तब जाकर कहीं कुंभकर्ण ने आंखें खोलीं और अंगड़ाई ली। गणपति महाराज को पुणे के तथाकथित उत्सव वालों ने कुंभकर्ण समझ रखा है क्या? बल्कि इस जागरूक गणपति ने अपने उत्सव की `आपसी फूट’ को खत्म करने के लिए विद्यानंद बापट को वाहन बनाकर भेजा और डीजे वगैरह के भूकंप का विरोध कराया, लेकिन उत्साहित उत्साह में चूर भक्तों ने उन्हीं विद्यानंद पर हमला करके हिंदुत्व की धज्जियां उड़ार्इं। ध्वनि प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए घातक होने का मुद्दा बापट ने उठाया। इस पर बापट `नास्तिक’ और `दिमागी नक्सल’ हैं, ऐसा आरोप पुणे के बुद्धिमान अतिवादियों ने लगाया।
जागरूक आम नागरिक
होने के नाते किसी मुद्दे को उठाने में आस्तिक-नास्तिक होने का सवाल कहां से आता है? नास्तिक या प्रगतिशील होना क्या कोई अपराध है? आस्था का ढोंग, अंधविश्वास का फैलाव और उससे पैदा हुई अंधभक्ति को ही हिंदू धर्म समझने वालों को बापट ने चुनौती दी। विद्यानंद बापट बाहरी हैं, मूल पुणेकर नहीं हैं, ऐसा हंगामा खुद को असली पुणेकर कहने वाले लोगों ने किया। पुणे के उत्सवों पर बोलने का अधिकार बापट को नहीं है, यह इन लोगों का दावा है। यह दावा मूर्खतापूर्ण है। अंग्रेजों की डेढ़ सौ साल की गुलामी भारत ने सही। उनका शासन ईश्वर का वरदान होने का साक्षात ज्ञान तब पुणे की कुछ `असली’ मंडली को हुआ था, लेकिन इस गुलामी के खिलाफ बगावत करने वाले और `स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ कहने वाले तिलक पुणेकर नहीं थे। वे रत्नागिरी से पुणे आए थे। जिन पेशवाओं का अभिमान आज भी पुणेकरों को है, वे पेशवा भी मूल पुणेकर नहीं थे। पेशवाओं का मूल और कुल कोंकण का है। पुणेकरों को आज जिन पर भी अभिमान महसूस होता है, वे सभी लोग पुणे के बाहर से ही आए थे। इसलिए एक आम बापट ने `डीजे’ के मुद्दे पर आवाज उठाई, तो उसे बाहरी कैसे ठहराते हो? पुणे की अधिकांश संपत्ति, व्यवस्था और जमीनें आज `बाहरियों’ के कब्जे में चली गर्इं, इसका इन `असली’ पुणेकरों को न कोई पछतावा है और न कोई दुख! पुणे की शान खो गई है। फर्ग्यूसन कॉलेज, एस.पी. कॉलेज वाकई महाराष्ट्र के काशी थे। गांव-गांव के होनहार छात्र अपनी-अपनी संस्थाओं का अभिमान लेकर आते और मुठा नदी का पानी पीकर पुणेकर बन जाते। जिंदगी कहीं भी बीते, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद पुणे आकर वहीं की मिट्टी में विलीन होना है, गायकवाड वाड़ा से गाते-बजाते ओंकारेश्वर पहुंचना है, यही उम्मीद उस समय कई लोग रखते थे। पुणे की भाषा को
महाराष्ट्र की भाषा
कहा जा रहा था। पुणे की वेशभूषा, रीति-रिवाज, परंपराएं, साहित्य, उत्सव और आंदोलनों ने पूरे महाराष्ट्र को प्रभावित कर रखा था। धनिकों और सेठों ने मुंबई को बहुरंगी-बहुढंगी बनाया था, लेकिन विद्वत्ता के बल पर पुणेकर सीना तानकर मुंबई को चुनौती दे रहे थे। पुणे में देशहितवादी, फुले, चिपलूणकर, रानाडे, गोखले, तिलक, आगरकर जैसे महान तेजस्वी पुरुषों की एक श्रृंखला ही खड़ी हुई। देशकार्य के लिए यह जनशक्ति पुणे ने ही मुहैया कराई। जिन लोगों और जिस संस्कृति को पुणे ने पाला-पोसा, उसी पुणे का सार्वजनिक गणेशोत्सव विवाद और दंगों का विषय बने, यह दुखद है। `डीजे’ की भूकंपीय आवाज हमारी संस्कृति नहीं है। `डीजे’ एक व्यवसाय है और उस पर कई लोगों का रोजगार निर्भर है, यह सच है और इस मुद्दे पर भी समाधान निकलना चाहिए। मुख्यमंत्री फडणवीस ने जनसंवाद के जरिए `डीजे’ पर समाधान निकालने की सलाह दी, जो मूल मुद्दे से भागने का रास्ता है। कानून क्या कहता है, यह बताइए। श्री गणराया के आगमन और विसर्जन के जुलूसों में ध्वनि प्रदूषण का अपराध करने की अनुमति देना तर्कसंगत नहीं ठहरता। छत्रपति शिवाजी महाराज ने लाल महल में शाइस्ता खान की उंगलियां काटी थीं और प्रतापगढ़ पर अफजल खान का पेट फाड़ा था, तब मावलों ने `डीजे’ का भूकंप नहीं लाया था। तिलक मंडाले जेल से छूटकर पुणे लौटे थे, तब भी उनके स्वागत में `डीजे’ नहीं बजाए गए थे, यह बात पुणेकरों को कौन समझाए? जिन्हें मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से तकलीफ होती है, स्वास्थ्य बिगड़ता है और लाउडस्पीकर धर्मविरोधी लगते हैं, वे लोग `डीजे’ के भूकंप का समर्थन करते हैं। उन्होंने विद्यानंद बापट के साथ मारपीट की। इसके बावजूद पुणेकरों ने `डीजे’ के खिलाफ रविवार को मोर्चा निकाला ही। वह मोर्चा पुणेकरों की सार्वजनिक आवाज है। उसका श्रेय सार्वजनिक रूप से विद्यानंद बापट को ही देना पड़ेगा।
